दलहन की अधिकता, चीनी की कमी

सरकार समस्या को अवसर में बदलेगी?

संपादकीय

अन्न मुद्रास्फीति को असर करे ऐसे दो महत्व के क्षेत्र में विपरीत परिस्थिति सर्जित हुई है। चीनी में कमी के कारण भाव वृद्धि की और दलहन में विपुल पैदावार के कारण भाव में गिरावट की स्थिति है। यह दोनों स्थिति उद्योग और उपभोक्ताओं के हित में नहीं है। सरकार इस परिस्थिति को अभी नियंत्रण में ले सकती है। वह इस दिशा में कार्यरत बनेगी ऐसा विश्वास है। 

चीनी में बढ़ते भाव की समस्या आर्थिक और राजनीतिक दोनों प्रकार की है। रेýटग एजेंसी इक्रा का अनुमान है कि 31 दिसंबर के अंत में देश में चीनी का उत्पादन इस मौसम में 9 प्रतिशत घटेगा और मांग दो–तीन प्रतिशत बढ़ेगी। चीनी कारखानों के पास इस सीजन के आरंभ में नवंबर 2016 में 76 लाख टन का स्टाक था। चीनी के कम उत्पादन और स्टाक के कारण थोक बाजार में भाव 16 प्रतिशत बढ़ गया है।

चीनी के बढ़ते भाव की स्थिति जितनी उत्पादकों के लिए अच्छी है उतनी किसानों, ग्राहकों और सरकार के लिए नहीं है। 5 राज्यों में चुनाव आगामी महीने से हो रहे है । तब चीनी की भाव वृद्धि सरकार के लिए अकुलाहट पैदा करने वाली है। विदेश में भी भाव बढ़ रहा है। तब सरकार कच्ची चीनी के आयात द्वारा आपूर्ति बढ़ाकर भाव पर नियंत्रण लगा सकती है। सरकार उद्योग के दबाव में आयात नहीं करेगी तो मुद्रास्फीति बढ़ेगी। 

दलहन में विपुल पैदावार के कारण 300 मंडियों में बाजार भाव प्राप्ति भाव से भी नीचे चला गया है। तिलहन उत्पादक राज्यों के किसान दलहन का ज्यादा पैदावार करके पकााताप कर रहे है । इसके लिए सरकारी एजेंसियां दोषी है । जो प्राप्ति के लिए पर्याप्त सक्रिय नहीं हुई है । सरकार ने 25 कृषि उत्पादों की प्राप्त मूल्य घोषित किया है। लेकिन, ये एजेंसियां गेहूं और चावल से आगे नहीं बढ़ती है ।

भारत में दलहन की परंपरागत तंगी रही है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने अफ्रीकन देशों में जाकर कान्ट्रैक्ट फार्मिंग तथा आयात की व्यवस्था की है। एजेंसियां दलहन का बफर स्टाक बनाने के लिए बड़े पैमाने पर खरीदी शुरू करें उसके लिए सरकार को मध्यस्थता करनी चाहिए।

समस्या को अवसर में बदलने की क्षमता इस सरकार में है उसे सिद्ध करने का फिर से अवसर मिला है।

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