बजट : राष्ट्रपतिजी का संदेश और समर्थन
पांच राज्यों के चुनाव से पहले बजट पेश न करने की मांग विपक्ष कर रहा है। बजट की तारीख आगे बढ़ाने के लिए विपक्ष राट्रपति और चुनाव आयोग के कमिश्नर से मिला है तब राष्ट्रपतिजी ने विपक्ष के नेताओं और समझदार नागरिकों को परोक्ष रूप से सलाह दी है कि गरीब वर्ग को तत्काल राहत देने की जरूरत है और सरकार कदम उठा रही है जिससे लोगों को जरूर राहत मिलेगी, लेकिन गरीब वर्ग लंबे समय तक प्रतीक्षा नहीं कर सकता (अर्थात् बजट में राहत देने में विलंब उचित नहीं है) विपक्ष मात्र वोट-सत्ता की राजनीति और राजनीतिक लाभ की चिंता करता है, जबकि राष्ट्रपतिजी ने राष्ट्र के हित में, अर्थव्यवस्था की सलाह दी है।

नूतन वर्ष के उपलक्ष्य में राष्ट्रपतिजी राज्यों के गवर्नरों को संबोधित कर रहे थे और उस अवसर पर उन्होंने चुनाव और बजट का नाम लिए बिना यह सलाह दी है। मीडिया में `अर्धसत्य' शीर्षक दिया गया है कि `नोटबंदी से अल्पावधि के लिए मंदी आएगी और फिर अर्थव्यवस्था को लाभ होगा, लेकिन गरीब वर्ग को राहत की तत्काल जरूरत है- यह वर्ग कितने समय तक प्रतीक्षा करेगा वह कहा नहीं जा सकता''। राष्ट्रपतिजी ने जोर देकर यह भी कहा है कि ``गरीब वर्ग को इस समय ही राहत एवं सहायता की जरूरत है जिससे वे भूख और बेकारी के खिलाफ जंग में जुड़ सकें। प्रधानमंत्री ने हाल में ही ``पैकेज'' घोषित किया है जिससे थोड़ी राहत जरूर मिलेगी।'' मीडिया में निवेदन का यह दूसरा भाग मानो दब गया है!

आठ नवंबर को नोटबंदी की घोषणा प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने की तब भी राष्ट्रपतिजी ने निवेदन जारी कर समर्थन दिया था और अब बजट रोकने की मांग हो रही है तब भी उन्होंने प्रधानमंत्री को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया है और विपक्ष के नेताओं को सलाह दी है।

हकीकत में प्रधानमंत्री ने लखनऊ की सार्वजनिक सभा में ``मिनी बजट'' के रूप में जो निर्णय घोषित किया, उसके ब्यौरेवार और अधिकृत अमल के लिए बजट में घोषणा अनिवार्य है। यदि बजट में विलंब हो तो अमल में भी विलंब होगा। किसी भी चुनी गई सरकार को इस तरह से राहत का पैकेज घोषित करने का विशेषाधिकार - सत्ता होती ही है। एक बात सच्ची है, गौरतलब है कि नरेद्र मोदी ने नोटबंदी का टाइमटेबल पर्याप्त सावधानी से बनाया-जिसमें चुनाव, बजट की तारीखों की ठीक  से गणना हुई है। अब विपक्ष उलझन में है।

पांच राज्यों में विधान सभा के चुनाव का कार्यक्रम घोषित होते ही विपक्ष अचानक जागृत और सक्रिय हो गया। केंद सरकार का बजट 1 फरवरी को संसद में पेश होने वाला है ऐसी घोषणा पहले की जा चुकी है। अब चुनाव आयोग ने 4 फरवरी से 8 मार्च के दौरान 5 राज्यों में मतदान के दिन निश्चित कर घोषणा की है। तब विपक्ष की दलील–शिकायत है कि बजट में राहत की बरसात कर नरेद्र मोदी मतदाताओं को रिझा लेने में सफल होंगे। बजट का राजनीतिक लाभ सरकार को और वित्तीय लाभ मतदाताओं को न मिले इसके लिए चुनाव हो जाने के बाद बजट पेश करने की सूचना सरकार को देनी चाहिए...

यह मांग–विरोध हो रहा है लेकिन चुनाव आयोग को खबर थी ही कि एक फरवरी को बजट पेश होने वाला है। विपक्ष को भी बजट के तारीख की जानकारी थी। क्योंकि अधिकृत घोषणा हुई थी तो वे तब क्यों नहीं जागे? चुनाव आयोग ने भी बजट की तारीख पर विचार कर ही मतदान के कार्यक्रम की घोषणा की है। बजट की तारीख घोषित हुई तभी ही विपक्ष को जाग जाने की जरूरत थी। 

विरोध का कारण भी स्पष्ट है–राहतों की बारिश होगी! ऐसी धारणा–अपेक्षा पहले से ही थी और सरकार की भी तैयारी थी। प्रधानमंत्री ने लखनऊ में मिनी बजट का पेपर लीक कर दिया ऐसी शिकायत की जा रही है। लेकिन प्रधानमंत्री की घोषणाएं वैध है और जिससे चुनाव आयोग भी कुछ नहीं कर सकता। अब आचार संहिता लागू होने से संसद के बाहर ऐसी नीति विषयक घोषणा की मनाही है। संसद में बजट रोका नहीं जा सकता। यह निर्णय सरकार और सत्ता संसद की है। विपक्ष वर्ष 2012 की बात करता है। लेकिन भूल जाता है कि तब बजट चुनाव बाद पेश करने का आदेश आयोग ने नहीं दिया था। बल्कि सरकार का ही निर्णय था। 

विपक्ष को ýचता वोट की है। संसद में और संसद के बाहर भी नोटबंदी का विरोध किया। लेकिन कहीं दंगा-फसाद नहीं हुए। सिविल वार होने की धारणा फलीभूत नहीं हुई और नरेद्र मोदी तो इंदिराजी जैसा व्यूह अपना रहे है । गरीब–मध्यम वर्ग राजी होता है कि ब्लैकमनी का खजाना पकड़ा गया है। गरीब–मध्यम वर्ग को  आर्थिक पंडितों के भाषण और आंकड़ेबाजी में रुचि नहीं है। अब परेशानी कम हुई है  या नहीं। भाववृद्धि रुके और अनाज–सब्जी सस्ती हो बस इतने पर ही राजी।  नोटबंदी से गैर–लाभ के स्थान पर मोदी लाभ उठा लें उसकी चिंता और विरोध है। चुनाव आयोग अधिक से अधिक पांच राज्यों के लिए विशेष योजना घोषित न करने का आदेश दे सकता है। वित्तमंत्री तो भारत का है और पांच राज्य भारत में है । जिससे राष्ट्रीय घोषणा का लाभ इन राज्यों को भी मिल सकता है।

चुनाव में नोटबंदी के अलावा अन्य मुद्दे भी है–उसकी ýचता नेताओं को होना स्वाभाविक है। एक तो ब्लैकमनी की रेलमपेल संभव नहीं होने के बावजूद चुनाव आयोग उम्मीदवार और पार्टी द्वारा होने खर्च पर नजर रखेगा। 20 हजार रुपए से अधिक रकम का खर्च नकदी में न करने की सलाह दी गई है। इसके अलावा उम्मीदवार और उनके परिवार की सम्पत्ति की सच्ची (झूठी) घोषणा किया जाना पर्याप्त नहीं है। अब उम्मीदवार और परिवार को आय के साधन और स्रोत की भी घोषणा करनी होगी। चुनाव आयोग ने इससे संबंधित एफिडेविट सुप्रीम कोर्ट पेश की है। मनी पावर का प्रभाव समाप्त करने की दिशा में यह निर्णय महत्वपूर्ण है। 

सुप्रीम कोर्ट ने हाल के फैसले में कहा कि प्रचार के दौरान धर्म का उपयोग, जातिवाद (आरक्षण के लिए) का उपयोग ``भ्रष्ट'' नीति--रीति माना जाएगा और चुनाव रद्द हो सकता है।