उत्तर प्रदेश की नई सरकार के समक्ष विकास बढ़ाने की होगी चुनौती

नए निवेश जुटाने हेतु चौतरफा ध्यान केद्रित करने की जरूरत

रमाकांत चौधरी   

नई दिल्ली । उत्तर प्रदेश की नई भाजपा सरकार को आर्थिक गतिविधियों को बढावा देने को लेकर वित्तीय निवेश जुटाने की विशेष रुप से चुनौती होगी।चूंकि देश में इस समय जितना निवेश हो रहा है जिसका आंशिक यानि चार प्रतिशत से भी कम निवेश उत्तर प्रदेश में हो रहा है।जिसके तहत उत्तर प्रदेश में जो निवेश आता भी है वह दिल्ली से बिल्कुल सटे उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद और गौतमबुद्वनगर जैसे एनसीआर के जिलों में सिमट कर रह जाता है।

दरअसल मोदी सरकार के अधिनस्थ्य कार्यरत औद्योगिक नीति एवं संवर्द्वन विभाग (डीआइपीपी) के ताजा आंकड़ों के तहत पिछले कैलेंडर वर्ष में जनवरी से लेकर दिसम्बर तक देश भर में कुल 414086 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव आए।जिसके तहत एक तरफ सिर्फ 3.44 प्रतिशत निवेश के प्रस्ताव ही उत्तर प्रदेश के लिए आए।इस अवधि में उत्तर प्रदेश में सिर्फ 13722 करोड़ रुपए के निवेश प्रस्ताव आए।वहीं दूसरी तरफ कर्नाटक,गुजरात, महाराष्ट्र,आन्ध्र प्रदेश,उड़ीसा और तेलंगाना जैसे प्रदेशों में उत्तर प्रदेश से काफी अधिक निवेश राशि के प्रस्ताव आए।ऐसे में पिछले वर्ष़ों के तहत देश में आए कुल निवेश प्रस्तावों में  उत्तर प्रदेश का हिस्सा बढा नही हø।वैसे भी निवेश के मामले में उत्तर प्रदेश को विकास के विभिन्न पैमानों पर राष्ट्रीय औसत की बराबरी करने में कई दशक लग सकते हø।ऐसे में उत्तर प्रदेश की नई सरकार को लेकर निवेश जुटाना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।चूंकि विगत वर्ष़ों में उत्तर प्रदेश की छवि निवेश के अनुकूल नहीं रही है।जिसके चलते निवेशक उत्तर प्रदेश में निवेश के मामले में हिचकते रहे हø।जिसका मुख्य वजह एक तरफ उत्तर प्रदेश में बिजली और सड़क जैसी बुनियादी सुविधओं का अभाव रहा है।वहीं दूसरी तरफ प्राकृतिक संसाधनों का न होना भी रहा है।ऐसे में नई सरकार को उद्योगों को आकर्षित करने को लेकर काफी प्रयास करने होंगे।इसके साथ ळी निवेाि को दिल्ली एनसीआर के नोएडा,गाजियाबाद से आगे बढाकर बुंदेलखंड जैसे पिछड़े क्षेत्रों में ले जाना होगा तभी जाकर उन क्षेत्रों में रोजगार के पर्याप्त अवसर सृजित हो सकेंगे।

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