वोटिंग मशीन : विवाद बढ़ेगा?

उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव में भाजपा द्वारा अभूतपूर्व विजय प्राप्त करने के बाद उमर अब्दुल्ला ने कांग्रेस तथा अन्य विपक्ष को सलाह दी थी कि 2019 के चुनाव को भूल जाओ और 2024 की चिंता तथा तैयारी शुरू कर दो- इसके बाद प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने भाजपा के सांसदों और कार्यकर्ताओं को आह्वान कर दिया है कि ``मø चैन - आराम से बैठूंगा नहीं और बैठने दूंगा नहीं''। गरीब कल्याण योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए युवाओं की सेवा लेने का अनुरोध किया है। नरेद्र मोदी सिर्फ वचनों का प्रचार करना नहीं चाहते। वचनों की पूर्ति, सरकार द्वारा लिए गए निर्णय और शुरू हुए अमल की जानकारी लोगों तक पहुंचाना चाहते हø, जिससे वे लाभ ले सकें। इस बीच उत्तर प्रदेश में सरकारी अधिकारी वर्ग और पुलिस तंत्र सतर्क - सावधान हो गया है। गत 15 वर्ष की पहुंचशाही और तूमारशाही अब नहीं चलेगी। विधानसभा के चुनाव में भाजपा द्वारा दिए गए वचनों के अमल के लिए पांच वर्ष की अवधि नहीं है - 2019 में ही रिपोर्ट कार्ड पेश करने का इरादा है।

दूसरी ओर, विपक्ष का संबंध है वहां तक `ग्रान्ड एलायंस' - अन्य मोर्चा बनाने की बात शुरू हुई है, लेकिन ऐसे प्रयास आसान नहीं है। विपक्ष की छावनी में काफी विरोधाभास है। नेताओं के अहम और हित टकराते है जिससे संसद में मोर्चा भले आसान हो- चुनाव के लिए आसान नहीं है।

इसी बीच, विपक्ष के हाथ में नया मुद्दा आया है और ऐसा लगता है कि इसे और उछाला जाएगा। `वोटिंग मशीन' लाए जाने के बाद मतदान सुरक्षित होने के बावजूद उसके बारे में विवाद-आपत्ति उठायी जाती रही है। हमारी मशीनों में किसी प्रकार का गोलमाल संभव न होने से विदेशों में मांग बढ़ी है और हम निर्यात भी करते है ।

इस बार परिणाम में भारी पराजय देखने के बाद सबसे पहले मायावती ने वोटिंग मशीनों के खिलाफ आपत्ति जतायी और आरोप लगाया कि गोलमाल किया गया है और मुझे मिलने वाला वोट अन्य खाता में गया है। मायावती के मुद्दे को केजरीवाल ने तुरंत उठा लिया और आरोप लगाया कि पंजाब में मेरा मत अकाली और कांग्रेस में गया है - यह `गोलमाल' हुआ है! और अब अखिलेश यादव भी सुर मिला रहे है कि इन मशीनों का दुरुपयोग हुआ है।

वास्तव में वोटिंग मशीनों का दुरुपयोग होने की - टेम्परिंग होने की संभावना ही नहीं है। इसके बावजूद विरोधी नेता अब `सीबीआई' की जांच मांगे और वोटिंग मशीनों तथा चुनाव से ही लोगों का विश्वास डिग जाए, ऐसा शोरगुल मचाएं तो आकार्य नहीं। यद्यपि लोग जानते हø कि उन्होंने वोट किसे दिया है। पिछले चुनाव में जीते तब क्यों मशीन में भूत नहीं दिखा? ऐसा आक्षेप दुनियाभर में होता है। अमेरिका के प्रमुख पद के चुनाव के समय डोनाल्ड ट्रम्प ने भी वोटिंग मशीनों और गोलमाल का आरोप लगाया था। चुनाव बाद जांच करने का उन्होंने आश्वासन दिया था। यह `जांच' अब– विजय के बाद–कितनी हुई होगी?  

हमारे देश में वर्ष 1982 में वोटिंग मशीन लगाई गई,  इसके पहले चुनाव आयोग का कामकाज काफी विकट था। इतना ही नहीं उत्तर प्रदेश और बिहार में तो बैलेट बाक्स–मतपेटियां ही उठा ली जाती थीं। बाहुबलियों का बोलबाला था। मनी पावर की तुलना में मसल पावर के कारण लोग मत देना भी टालते थे। 1970 के चुनाव में रायबरेली में इन्दिरा गांधी और अमेठी में संजय गांधी उम्मीदवार थे। तब इमर्ज़ेंसी के कारण जनमत इंदिराजी के खिलाफ था और जीतने की आशा नहीं थी। कांग्रेस और सरकार को भी पराजय का भरोसा था। तब रायबरेली के मतदान केंद्रों से मतपेटियां गणना के लिए एकत्र की गइú तब ये पेटियां उठा ले जाने के लिए बाहुबलियों ने हमला किया था। लेकिन, मतगणना कर रहे चुनाव आयोग के कर्मचारियों ने मतपेटियों को पकड़ रखा और माथे–शरीर पर लाठियों की मार खाई व पुलिस दल आने तक लोकतंत्र की रक्षा की!

वोýटग मशीन आने के बाद गणना त्वरित और सरल बनी है। परिणाम तुरंत घोषित होते हø और जिससे स्वागत हुआ है। यद्यपि छोटी–मोटी शिकायतें व्यक्त होती रही है । लेकिन, इतने वर्ष के बाद अब पराजित पार्टियों ने शंका के स्थान पर आरोप लगाना शुरू किया है और उत्तर प्रदेश की 3 मुख्य पराजित पार्टियों ने वोटिंग मशीन में गोलमाल होने की ``हवा'' फैलायी है। 2019 तक यह हवा–कुप्रचार के गुब्बारे से यह हवा निकाल देने की जरूरत है। क्योंकि पूरे देश में चुनावी प्रक्रिया और लोकतंत्र से विश्वास डिग जाने की संभावना निर्मूल होनी चाहिए। भूतकाल में इंदिराजी की विजय के बाद तत्कालीन जनसंघ के नेता बलराज मधोक ने आरोप लगाया था कि रूस से स्याही मंगाकर गोलमाल किया है। लेकिन जनसंघ ने आरोप का समर्थन नहीं किया था। 

प्रश्न यह है कि मशीन में गोलमाल किस तरह होगा? पूर्व चुनाव आयुक्त कुरेशी साहब ने विस्तृत जानकारी देकर गोलमाल का खंडन किया है और वोटिंग मशीन में पूरा विश्वास व्यक्त किया है। पिछले 16 वर्ष के दौरान राज्यों के विधानसभाओं के 107 बार और लोकसभा के राष्ट्रीय चुनाव 3 बार हुए है । कभी ऐसी शिकायत नहीं हुई। ये मशीने हमारी सार्वजनिक क्षेत्र की दो स्वदेशी कंपनियों द्वारा बनाई जाती है और सभी मशीने नेटवर्क से जुड़ी नहीं होती है –हर क्षेत्र में अलग–अलग मशीने होती है । जुड़ी हों तो गोलमाल संभव है। साथ ही, मशीनों में राज्यवार अलग–अलग पार्टियों की सूची होती है। उसमें पार्टियों के नाम के साथ उम्मीदवारों के नाम फाइनल होने के बाद बटन निश्चित होता है और इस प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग के नियंत्रण में मशीने होती है । मतदान के पहले राजनीतिक पार्टियों के प्रतिनिधियों को जानकारी दी जाती है। मतदान और गणना के समय भी उनको बताकर सील बन्द किया जाता है। इस चरण में किसी पार्टी ने आपत्ति नहीं जताई। परिणाम घोषित होने के बाद चुनाव आयोग का कार्य पूरा होता है और शिकायत के लिए परिणाम घोषित होने के बाद के 45 दिन में हाईकोर्ट में जाने की समय सीमा है।

इस बीच, वोटिंग मशीन में जो बटन दबाया जाय उसकी नकल मशीन में अटैच किये गये एक प्रिंटर में कागज पर छप जाए ऐसी व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट के आदेश से की गई है। यह छपी प्रति मतदाता के मांगने पर दिखाने के बाद सील बन्द बाक्स में रखी जाती है और गणना के समय जरूरत पड़ने पर खोली जाती है। लोकसभा के चुनाव में 543 मतदाता क्षेत्रों में यह व्यवस्था की गई थी। 

इस बार, पंजाब में 117 में से 33 सीटों के लिए भी यह व्यवस्था की गई थी। 

केजरीवाल जांच के लिए देर से जागे है । लेकिन, उनका आशय जांच नहीं विवाद और अविश्वास पैदा करना है। मूल तो वे अराजकता में विश्वास करते है ना।

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