शतरंज के खिलाड़ी

संसद के बजट सत्र में जीएसटी सहित महत्वपूर्ण विधेयक पारित होने के बाद एनडीए सरकार ने संतोष की सांस ली है और अब आठ राज्यों में विधानसभाओं की दस सीटों के उपचुनाव में से पांच सीट प्राप्त करने की खुशी है। उड़ीसा में भाजपा की राष्ट्रीय कारोबारी की बैठक की पूर्वसंध्या पर राज्यों में भाजपा को सीटों की भेंट मिली है जिससे नेता और कार्यकर्ता हर्षित है, जबकि कांग्रेस और अन्य पार्टियां पराजय के लिए वोटिंग मशीन को दोष दे रही है। संसद के सत्र की समाप्ति के साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनियाजी के नेतृत्व में विपक्ष के प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपतिजी को ज्ञापन देकर एनडीए सरकार, प्रधानमंत्री और वोटिंग मशीन के बारे में शिकायत की।

वोटिंग मशीन का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है और कोर्ट ने मशीन के साथ पेपर प्रिन्ट को जोड़ने की और प्रमाण रखने की बात की है - यह तो चुनाव आयोग को स्वीकार्य है ही। इतना ही नहीं बल्कि आयोग ने तो खुली चुनौती दी है कि वोटिंग मशीन `हैक' कर बताओ! चुनाव आयोग की काबिलियत ही नहीं, निष्ठा और लोकतंत्र की प्रतिष्ठा का प्रश्न है। मायावती, ममतादीदी और केजरीवाल के साथ इस शिकायत में कांग्रेस के जुड़ने का एक ही कारण है की कांग्रेस को महागठबंधन करने की और नेतृत्व करने की उतावली है! लेकिन कांग्रेस के ही सिनियर नेता वीरप्पा मोइली ने सार्वजनिक में कहा है कि मशीन में कोई गड़बड़-घोटाला नहीं है। मोइली ने आगे बढ़कर यह भी कहा है कि कांग्रेस ने अब सेक्युलरवाद के नाम पर मुस्लिम वोटबøक की नीति पर पुन:विचार करने की जरूरत है।

वीरप्पा मोइली हो या दिग्विजय सिंह हों- वे चाहे जैसे भी पुनर्विचार की बात करें। आज कांग्रेस में सुनता है कौन? सोनियाजी की तबियत खराब होने के बावजूद आज पार्टी में उनका नाम और मान है, लेकिन वह राहुल गांधी को रोक-या टोक नहीं सकती और पार्टी की हालत इस समय `नाविक बगैर नाव' जैसी हो गई है। पंजाब विधानसभा में विजय मिली और कर्नाटक में दो उपचुनाव में जीत स्थानीय - क्षेत्रीय नेताओं के कारण मिली है। अन्य राज्यों में क्षेत्रीय नेता कहा है? कौन है?

उपचुनावों में बड़ा झटका अरविंद केजरीवाल को लगा है। पंजाब, गोवा और गुजरात को कब्जे में करने का ख्वाब देखने वाले इस अराजकतावादी नेता की नाक बराबर कटी है। दिल्ली में कांग्रेस भाजपा के बाद दूसरे नंबर पर आयी और केजरीवाल के उम्मीदवार की डिपाजिट जब्त हो गई। चाहे जो हो कांग्रेस संस्था और लोकतंत्र में वह जरूरी है - अराजकता को स्थान नहीं है।

इसी बीच - राष्ट्रपतिपद के चुनाव के लिए छावनियां सुसज्ज हो रही है। राष्ट्रवादी कांग्रेस के नेता शरद पवार का कहना है कि भाजपा को हटाने ने लिए और अपना अस्तित्व टिकाए रखने के लिए क्षेत्रीय पार्टियों को एकत्र होना पड़ेगा। किसके नेतृत्व के तहत? शरद पवार के? कांग्रेस को तो शरद पवार का भरोसा ही नहीं है और जिससे पवार ने जनता दल (यू) के साथ गुजरात विधानसभा का चुनाव लड़ने का निर्णय किया है। प्रफुल पटेल को आगे कर रहे है ।

लेकिन राजनीतिक शतरंज में अमित शाह पक्के खिलाड़ी  है । गुजरात में स्वयं चलकर शंकरसिंहजी से मिलने गए उस पर आकार्य नहीं है, बल्कि पहले से घोषणा करके गए। गुजरात कांग्रेस में उलझन चालू रहे, उसमें किसे रुचि नहीं है?

इसी तरह महाराष्ट्र के नारायण राणे कांग्रेस के नेता है । शिवसेना छोड़कर कांग्रेस में आए है, लेकिन अब भाजपा में जाने की संभावना चर्चा में है! मुख्यमंत्री फडणवीस के साथ अहमदाबाद में अमित शाह को मिलने के लिए क्यों गए? शिवसेना के सुप्रीमो उद्धव ठाकरे आखिरकार अमित शाह के आमंत्रण का सम्मान करते हुए दिल्ली गए। अमित शाह, गडकरी के टेबल पर साथ बैठे और नरेद्र मोदी को बड़ा भाई कहा। लेकिन अब वाग्युद्ध - वनसाइड प्रहार बंद होगा? भाजपा का व्यूह रुको, प्रतीक्षा करो और सुनो - का है। देखना है कि राष्ट्रपति के चुनाव से पहले कौन कैसा पासा फेंकता है। शरद पवार भी क्षेत्रीय पार्टियों के नाम पर शिवसेना को मनाना चाहते है - लेकिन कांग्रेस पार्टी ऐसे समांतर मोर्चा को स्वीकार कर सकेगी? वामपंथी - मार्क्सवादी तो बंगाल से तड़ीपार हो रहे है ।

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