कपास का आयात 30 लाख गांठ की रिकार्ड ऊंचाई पर
मुंबई। भारत में कपास का आयात इस सीजन में 30 लाख गांठ के साथ रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। इससे पहले 2001-02 में कपास के आयात ने 25 लाख गांठ की रिकार्ड ऊंचाई को छुआ था। 2015-16 के सीजन में 20 लाख गांठ कपास का आयात किया गया था। इस सीजन में कपास की अच्छी कीमतों को देखते हुए किसानों द्वारा 2017-18 के सीजन में लगभग 15 प्रतिशत ज्यादा भूमि पर कपास की बोआई किये जाने की संभावना है।

भारतीय कपास निगम के चेयरमैन एम.एम. चोकालिंगम कहा कि कपास का बाजार और अंतर्राष्ट्रीय कीमतें काफी उम्दा होने की वजह से खासकर दक्षिण के अधिकांश मिल मालिकों ने आयात पर ज्यादा ध्यान दिया। दूसरी ओर कपास का निर्यात सीजन के आरंभ में 30 लाख गांठ तक पहुंच गया था जिसमें अंतर्राष्ट्रीय कीमतें भारत के मुकाबले अच्छी होने की वजह से अब कुछ ठहराव आ गया है। आमतौर पर घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय कीमतों में 7 प्रतिशत का अंतर होता है, लेकिन अब कीमतों के करीब करीब बराबरी पर आ जाने की वजह से विदेशी कपास के आयात से मुनाफा शानदार हो रहा है। चोकालिंगम के अनुसार, इस साल जनवरी से ही कपास मिल मालिकों के लिए आयात काफी आकर्षक रहा  है। ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीका से आयातित कपास में मुश्किल से 1 प्रतिशत कचरा निकलता है जबकि भारतीय कपास में 3 प्रतिशत, जिससे आयातित कपास से मुनाफे में अच्छी खासी वृद्धि हो जाती है।

भारतीय कपास नमी से लेकर मिलावट और भ्रष्टाचार आदि समस्याओं के चलते गुणवत्ता के पैमाने पर खरा नहीं उतरते, जिससे वस्त्र उत्पादक ज्यादातर आयातित कपास पर ही निर्भर रहना पसंद करते हø। साथ ही, भारतीय बाजार में डॉलर की लगातार आवक से रुपया मजबूती पर है जिससे आयात को बढ़ावा मिलता है। घरेलू बाजार में फिलहाल कपास का मूल्य 5200 से 5300 प्रति क्विंटल की रेंज में है, हालांकि सीजन के बीच में कीमतें 5800-6000 रु प्रति क्विंटल के निशान को भी पार कर गई थी। दक्षिण भारत के मिल मालिकों को गुजरात, राजस्थान और महाराष्ट्र से ऊंचे दामों पर कपास खरीदी और उनकी ढुलाई काफी महंगी पड़ती है, जबकि अफ्रीकी देशों से आयात करना काफी सस्ता पड़ता है। अंदरुनी जानकारों ने बताया कि सीजन के बीच में कुछ किसानों ने अपना स्टॉक रोक लिया था, जिससे आपूर्ति में कमी आयी और मिल मालिकों को आयात की ओर मुड़ जाना पड़ा। आयातित कपास का करीब 80 प्रतिशत माल अप्रैल के अंत तक आ चुका था तथा अब सीजन लगभग समाप्त होने पर है।