नए विश्वास के साथ
आजादी के नव वर्ष का आरंभ

आजादी के 71वें वर्ष की पूर्व संध्या पर देशभर में हो रहे परिवर्तन का अनुभव हो रहा है। भारत के भावी के लिए उम्मीद ही नहीं विश्वास बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने नूतन भारत के निर्माण का आह्वान किया है। भ्रष्टाचार, निरक्षरता, अस्वच्छता से मुक्ति के लिए पांच वर्ष का अभियान शुरू हो रहा है। गौरतलब है कि जनता का सहकार और सहयोग मिल रहा है। बीते वर्ष में राजनीतिक मोर्चे पर मोदी सरकार ने काफी सफलता प्राप्त की है। राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के चुनाव से पूर्व बिहार में लालू परिवार और कांग्रेस को छोड़कर नीतिशकुमार ने भाजपा की भागीदारी में सरकार बनायी है। हाथ से निकल गया राज्य फिर से भाजपा के हाथ में आया है। राज्यसभा में भी संख्या बल बढ़ा है। अब प्रधानमंत्री के सामने राजनीतिक विरोध और अवरोध घट रहे है जिससे विकास के मार्ग आसान बनने चाहिए। विशेषकर औद्योगिक उत्पादन और रोजगार बढ़ना आवश्यक है।

चीन की धमकियां आती रहती है, लेकिन भारत टस से मस नहीं होगा। यद्यपि कोई बड़ा युद्ध छेड़ने की मर्जी चीन की भी नहीं है और हम उसे जानते है । आतंकवाद के खिलाफ जबरदस्त कार्रवाई हो रही है। कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने की दिशा शुरू हुई है और अयोध्या में मंदिर-मस्जिद विवाद का सुखद समाधान होने की भूमिका बन रही है।

राजनीति का रंग बदल रहा है। भारतीय जनता पार्टी-एनडीए की शक्ति-संसद और राज्यों में बढ़ रही है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार विजयी हुए है । बिहार में नीतीश कुमार के साथ सत्ता की भागीदारी फिर से शुरू होने के बाद अब तमिलनाडु में अन्नाडीएमके भाजपा में जुड़ने की तैयारी कर रही है। राज्यसभा में तो एनडीए का संख्याबल बढ़ा है। अब भाजपा का लक्ष्य कर्नाटक, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश विधानसभाओं के आगामी चुनाव पर है और 2019 में लोकसभा के चुनाव की तैयारी भी हो रही है।

दूसरी ओर कांग्रेस की स्थिति कमजोर होती जा रही है तभी राज्यसभा की सीट अहमद पटेल को मिलने से पार्टी में और विशेष रूप से गुजरात कांग्रेस में नया विश्वास पैदा हुआ है, लेकिन बिहार में महागठबंधन टूटने-छूटने की शुरुआत होने के बाद अब राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ संबंध भी बिगड़ने की शुरुआत हुई है! राज्यसभा के चुनाव में राष्ट्रवादी के दोनों सदस्यों ने भाजपा को मत दिया है। कांग्रेस के नेतृत्व को राष्ट्रवादी के नेताओं पर शंका थी और अब शंका पक्की हुई है। यद्यपि औपचारिक रूप से नीतीशकुमार की तरह संबंध समाप्त नहीं किया है। इसी बीच कांग्रेस ने महागठबंधन के लिए नए सिरे से प्रयास शुरू किया है। शरद यादव को समर्थन देकर जनता दल (यू) में विभाजन करने का व्यूह है। हालांकि शरद यादव किसी तरह से नीतीश की बराबरी नहीं कर सकते। इसके अलावा लालू यादव परिवार के भ्रष्टाचार पकड़ाते जा रहे है तब शरद यादव बिहार में लालू की मदद लेंगे?

कांग्रेस पार्टी में और विपक्ष की छावनी में सोनियाजी की जिम्मेदारी अठारह पार्टियों को एक मंच पर - एक छत्र के  तहत लाने की है। राहुल गांधी इस समय महागठबंधन के नेता-अगुवा नहीं है । वास्तव में कांग्रेस में इस समय ``नए-पुराने'' का विवाद चल रहा है। राजीव गांधी और सोनियाजी के विश्वासपात्र नेताओं के स्थान पर राहुल गांधी के विश्वासपात्र – सलाहकारों का ग्रुप अलग है। अहमद पटेल को कांग्रेस पार्टी में सोनियाजी जितना मान और वजन देती है, उतना राहुल गांधी को देना पड़ेगा। कांग्रेस का कायाकल्प करने से पहले अनुभव और वफादारी को वरीयता देनी होगी।

कांग्रेस पार्टी में पहली बार स्वतंत्र सूर सुनाई दे रहा है। जयराम रमेश के स्पष्ट वक्तव्य और अभिमत के बाद मणिशंकर ने भी सूर मिलाया है। सल्तनत गई लेकिन सुलतानी – मनोदशा गई नहीं है। इन शब्दों में जयराम रमेश ने कांग्रेस के नेता- राहुल गांधी और उनके सिपहसालार राजाशाही-परिवारशाही पर प्रकाश डाला है। अब इस स्पष्ट और सत्य वक्तव्य के लिए उन पर प्रहार शुरू हुआ है। ऐसा माना जाता है कि सोनियाजी अब तत्काल राहुल गांधी को पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी साøपने की जल्दबाजी नहीं करेगी। कांग्रेस की आंतरिक स्थिति और क्षीण होती शक्ति यदि सुधरे नहीं तो महागठबंधन कहां से हो सकेगा?