मित्रों, उत्सव फिलहाल नहीं सतर्कता के मार्ग चिन्हों से नजर न हटे

सम्पादकीय
सितंबर तिमाही के जीडीपी अंकों में सर्वाधिक उल्लेखनीय एवं प्रोत्साहक दो बातें नजर आई हø। एक तो निवेश की वृद्धिदर 4.7 प्रतिशत दर्ज हुई है जो एक वर्ष पूर्व की समान अवधि में 1.6 प्र.श. थी. दूसरी बाबन सरकार के खर्च में कमी है जो आलोच्य अवधि में 4.1 प्र.श. दर्ज हुई है जो पूर्व वर्ष की समान अवधि के लिए 17.2 प्र.श. रही थी। इसका तात्पर्य यह है कि सरकार का खर्च घटने के बावजूद निजी क्षेत्र द्वारा अधिक निवेश होने के फलस्वरूप पूंजी निवेश में वृद्धि हुई है। इस पूंजी निवेश वृद्धि की निवल असर औद्योगिक उत्पादन वृद्धि में परिणित हुई है। इस वर्ष की जुलाई-सितंबर तिमाही में बढ़कर 5.8 प्र.श. (1.6 प्र.श.) रहा था। इस दूसरी तिमाही में गुड्स और सर्विसेज टैक्स (जीएसटी) लागू किया गया था।
अलबत्ता, जीएसटी लागू होने के पूर्व की अर्थात् वर्ष की प्रथम तिमाही (अप्रैल-जून) के दौरान जिन उत्पादकों ने अपना पुराना स्टाक बेच दिया था और उत्पादन घटाया था उसे पूर्ववत् करने के लिए उत्पादन बढ़ाया उसका भी आंशिक  हिस्सा रहा है। फिरभी यह नहीं भूलना चाहिए कि वर्तमान उत्पादन क्षमता का पूरा उपयोग होने के बाद ही नई क्षमता बढ़ाने के लिए नया निवेश किया जाता है। इस दृष्टि से दूसरी तिमाही में उत्पादन वृद्धि वर्ष की शेष दो तिमाहियों के लिए अच्छा संकेत देती है। इसका एक अच्छा असर रोजगार क्षेत्र पर भी होगा जिसकी अर्थव्यवस्था को  तीव्र आवश्यकता है। हमारी अर्थव्यवस्था में रोजगार निर्माण में उत्पादन की अपेक्षा सर्विस (सेवा) क्षेत्र का योगदान ज्यादा है। सेवा क्षेत्र की विकास दर 8.7 प्र.श. घटकर 7.1 प्र.श. हुई है। जो सावधान रहने का सिग्नल देती है। प्रथम दो तिमाहियों ने औसतन छह प्र.श. की आर्थिक विकास दर ही है। शेष दो तिमाहियों में उत्पादन वृद्धि की दर बरकरार रहे और सर्विस क्षेत्र की मामूली मंद पड़ी वृद्धि दर में सुधार हो जाए तो अर्थव्यवस्था में वर्ष 17-18 के दौरान पूर्व वर्ष की 6.7 प्र.श. की दर से विकास होना संभव हो सकता है इतना ही नहीं, सात प्र.श. की सरकार की उम्मीद फलित हो जाए तो भी कोई आकार्य नहीं।
क्या यह संभव है? यह तो समय ही बताएगा नोटबंदी व जीएसटी की विपरीत असर से अर्थव्यवस्था के संपूर्ण मुक्त होने से पहले ही सरकार ने अपना खर्च घटाकर निजी पूंजी निवेश में संभावित वृद्धि दर आधार रखा है। सरकार का यह सोचा समझा दाव खेला है। राजकोषीय घाटा बजट के 96 प्र.श. पर पहुंच गया है। ऐसे में वर्तमान वर्ष के लिए जीडीपी के 3.2 प्र.श. से आगे न निकले इसके लिए दृढ़ है। शेष दो तिमाहियों के दौरान सरकार का खर्च और घटने की संभावना है। निजी क्षेत्र द्वारा पूंजी निवेश का वर्तमान वेग बना रहे और सर्विस क्षेत्र भी निवल वृद्धि दिखाए तो ही इस वर्ष का आर्थिक विकास एवं उसके अलावा रोजगार वृद्धि का उद्देश्य भी पूरा हो सकता है। बाजार में धन की प्रवाहिता घटी है। सरकार के आर्डरों पर निर्वाह करनेवाले निजी क्षेत्र के उद्योगों को आर्डरों की कमी व वित्तीय तंगी से जूझना पड़ सकता है।
यद्यपि, आर्थिक विकास हेतु नीची ब्याज दर की अपेक्षा निवेशकों का आत्म विश्वास और उसके लिए अनुकूल माहौल अधिक महत्वपूर्ण है ये घटक अर्थव्यवस्था में मौजूद है। अत: चिंता का कोई कारण नजर नहीं आ रहा। फिरभी ऐसा समय अभी नहीं आया कि जीडीपी वृद्धि का उत्सव मनाने के चक्कर में सावधानी के मार्ग चिन्ह नजर से चूक जाएं।

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