भारतीय दुग्ध उद्योग के समक्ष अस्तित्व का संकट

भारतीय दुग्ध उद्योग के समक्ष अस्तित्व का संकट
एसएमपी की खपत से अधिक उत्पादन
हमारे संवाददाता
देश में स्किम्ड मिल्क पाऊडर (एसएमपी) की खपत से अधिक उत्पादन हो गया है।जिसके चलते भारतीय दुग्ध उद्योग के समक्ष अस्तित्व संकट पैदा हो गया है।ऐसी स्थिति में एक तरफ देश में एसएमपी का भंडार मार्च तक बढकर 2 लाख टन तक पहुंचने की आशंका है।वहीं दूसरी तरफ दुग्ध सहकारी इकाइयों के पास पहले ही 20 प्रतिशत अधिक दूध की मात्रा आ रही है।बहरहाल इन्हें एसएमपी में तब्दील करने की उनकी क्षमता पर्याप्त नहीं है।
दरअसल किसानों को दूध से मिलने वाला खरीद मूल्य औसतन 20 प्रतिशत कम हो गया है।ऐसे में यदि एसएमपी के खेप का निर्यात शीघ्र ही नहीं हुआ ता कीमतें और कम होने की आशंका है।ऐसे में मोदी सरकार को एसएमपी खरीदने को लेकर व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और सार्क देशों को एसएमपी भेजने को लेकर संभावनाएं तलाशी जाए।चूंकि दुग्ध उद्योग की हालत बेहद खस्ता है ऐसे में यथाशीघ्र कोई समाधान नहीं निकला गया तो दूध उत्पादकों को अपने अस्तित्व संकट से जूझना पड़ेगा।ऐसे में अगले सत्र में दूध उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा और किसान आहत होकर दुग्ध उद्योग से मूंह मोड़ने पर विवश हो सकते हø।जिसको लेकर कर्नाटक मिल्क फैडरेशन (केएमएफ) की तरफ से कहा जा रहा है कि इस वर्ष जून तक एसएमपी भंडार खाली करने की चाहत है।वहीं उत्तर भारत और महाराष्ट्र में निजी दुग्ध एवं जिंस कम्पनियों ने दूध खरीदना काफी कम कर दिया है।वैसे थी दिल्ली की निजी दुग्ध उत्पादकों के पास एसएमपी का भारी स्टाक बना हुआ है।जिससे घरेलू बाजार में एसएमपी की कीमत घटकर 150 रुपए किलो तक रह गई है और इसमें 30 प्रतिशत तक की कर्मी आ गई है।वहीं दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर एसएमपी की कीमत 115 रुपए प्रति किलो है।जिससे एसएमपी का निर्यात विकल्प नहीं रह गया है।इस समय आन्ध्र प्रदेश में जीसीएमएमएफ की तरफ से किसानों को पिछले वर्ष का खरीद मूल्य दे रहा है और इसे कम नहीं किया गया है।जिससे आन्ध्र प्रदेश में कीमत स्थिर है।यद्यपि निजी दुग्ध उत्पादक इकाइयों से सराबोर उत्तर प्रदेश में सहकारी समितियों ने दूध की खरीददारी 9 लाख लीटर प्रति दिन से घटाकर 5 लाख लीटर प्रति दिन कर दी गई है।

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