कर्नाटक के मतदाता परिवर्तन करेंगे?

कर्नाटक विधानसभा के चुनावों के परिणाम आगामी मंगलवार, दिनांक 15 मई को आ जाएंगे उसके बाद राष्ट्रीय राजनीति पर उसके संभावित असर संबंधी अटकलें और चर्चाएं चल रही है। कांग्रेस राज्य की सत्ता बरकरार रख पाएगी? इस प्रश्न के बदले कांग्रेस भाजपा की विजय यात्रा को अटका/ रोक सकेगी? यह प्रश्न चर्चा के केद्र में आ गया है। वर्ष 1985 के पश्चात होने वाले प्रत्येक चुनाव में जनता ने बदलाव के लिए फैसला दिया था। बहरहाल इस समय परिस्थिति अलग है। कांग्रेसी मुख्य मंत्री सिद्धारामैया ने परिवर्तन की हवा को रोकने के लिए ढाल लगाई है। मतदाताओं को मुफ्त चावल का राशन दिया है। - `अन्न भाग्य' योजना काफी लोकप्रिय है। इसके अलावा कन्नड भाषा, कर्नाटक का ध्वज और लिंगायत समाज को हिन्दू धर्म से अलग होने की मान्यता देकर भाजपा की हिन्दू वोट बैंक में सेंघ मारने का प्रयास किया है। अब इन सभी मुद्दों के साथ जातिवाद और अल्प संख्यक - मुस्लिम वाद को कितनी सफलता मिलती है यह समय के गर्भ में है। दूसरी ओर भाजपा ने राष्ट्रीय एकता - राष्ट्रवाद के साथ विकास का मुद्दा जोड़ा है। अलबत्ता सबसे बड़ा मुद्दा जोड़ा है। अलबत्ता सबसे बड़ा मुद्दा `मोदी' नाम का है। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने तकरीबन सत्रह महासभाओं को संबोधित किया और हवा का रुख बदला है। इसे ध्यान में रख दो साल बाद सोनिया गांधी को पहलीबार चुनाव प्रचार के लिए आना पड़ा है जो एक प्रकार का संकेत है।
राज्य सरकार के भ्रष्टाचार के मुद्दे को प्रचार के केद्र में रखने के प्रयास किए गए लेकिन इसका कितना असर पड़ा होगा यह विचारणीय है। क्योंकि मतदान पूर्व दस हजार मतदाताओं के नकली पहचान पत्र पकड़े गए और मत न देने के लिए भी एडवांस में पैसा दिया गया। इन मामलों के सबूत और रिपार्ट़ों के दृश्य टीवी चैनलों ने चमकाए। क्या इसका भी परिणामों पर असर दिखेगा भी क्या?
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पद का दावा घोषित किया है। यह मुद्दा भी प्रचार में आया है। यद्यपि राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेस के एकमात्र उम्मीदवार है और यह बात जगजाहिर है और इसका मतदाताओं को कोई आकार्य भी नहीं है। फिर भी इस प्रकार की घोषणा के पीछे आत्मविश्वास व्यक्त करने और अपने नेतृत्व में जनता का विश्वास जमाने का व्यूह हो सकता है। इस घोषणा का मतदान पर असर कितना होगा यह कोई कह नहीं सकता। अलबत्ता विपक्षी महागठबंधन पर तो अवश्य पड़ रहा है। अधिकांश विपक्षी नेताओं ने इस घोषणा को असामयिक - जल्दबाजी की और अपरिपक्व होने का मत व्यक्त किया है। एकमात्र अपवाद शिवसेना का है। उसका कहना है कि इस प्रकार की घोषणा करना राहुल गांधी का अधिकार है और इसकी आलोचना करने की आवश्यकता नहीं है। शिवसेना का इस प्रकार का अभिप्राय आश्चर्यजनक नहीं है। अलबत्ता शिवसेना का लक्ष्य कांग्रेस या राहुल गांधी नहीं बल्कि नरेद्र मोदी व भाजपा के प्रति द्वेष और शत्रुता का है।
भाजपा के अमित शाह ने पहले 224 में से 150 सीटें हासिल करने की घोषणा की थी अब वास्तविकता के धरातल पर आते हुए 130 सीटें हासिल करने का पूर्वानुमान घोषित किया है। कांग्रेस भी स्पष्ट बहुमत हासिल करने का विश्वास व्यक्त कर रही है। तीसरी संभावना त्रिशंकु विधान सभा की है। इस परिस्थिति में जनता दल (सेक्यूलर) के देवे गौड़ा और उनके पुत्र कुमार स्वामी पर निगाह और आधार रहेगा।
अतीत में कांग्रेस ने जनता दल (सेक्यूलर) को तोड़कर सिद्धा रामैया का अपहरण किया था अत: कुमार स्वामी को कांग्रेस पर भरोसा नहीं है। दूसरी ओर देवे गौड़ा ने कहा है कि यदि मेरा पुत्र भाजपा का साथ लेगा तो वह अलग हो जाने के लिए तैयार है। अलबत्ता राजनीति में अब क्या हो जाए - कौन कहां जाता है यह बताना मुश्कील होता है।
कर्नाटक में कांग्रेस सत्ता बचा पाई तो इस विजय का श्रेय राहुल गांधी को दिया जाएगा और यदि सत्ता हाथ से गई, तो पराजय का ठीकरा सिद्धारामैया पर फोड़ा जाएगा। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और भाजपा को कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। फिर भी, भाजपा को कर्नाटक में विजय प्राप्त हुआ तो इसका असर देशभर पर पड़ेगा और राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ की विधानसभाओं के साथ ही लोकसभा के चुनाव कुछ महीने जल्दी किए जाएं या राज्यों के चुनाव कुछ देरी से किए जाएं तो कोई आश्चर्य नहीं है।
इस राज्य के परिणाम राहुल गांधी के लिए अधिक कसौटी रूप व महत्वपूर्ण है।

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