छाते पर जीएसटी घटाकर पांच प्रतिशत करने की मांग


हमारे प्रतिनिधि
मुंबई। द अंब्रेला मेन्यूफैक्चरर्स एंड ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेश चोपड़ा ने मांग की है कि छाते पर हाल में जीएसटी की दर 12 प्र.श. है इसे घटाकर पांच प्रतिशत की जाए।
छाते में प्रयुक्त कपड़े की पेनल पर 5 प्र.श. जीएसटी है और पूरे छाते पर 12 प्र.श. जीएसटी लागू है। यदि इसे जाब वर्क पर बाहर से बनवाया जाय तो जीएसटी की 18 प्र.श. की दर लागू होती है। इस प्रकार एक ही उद्योग पर तीन-तीन प्रकार की दरें लागू होने से उलझन होती है। छाते का उत्पादन मुख्यत: सात राज्य महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, प. बंगाल, दिल्ली, कर्नाटक व केरल में किया जाता है।
उल्लेखनीय है कि छाता उत्पादन विकेद्रित कुटिर या लघु उद्योग क्षेत्रों में किया जाता है। किसान व छाता उद्योग दोनों मानसून पर भरोसा करते हैं। साथ ही यह रोजगारोन्मुख उद्योग है। चोपड़ा ने कहा कि प्राय: छाता और जूतों की तुलना की जाती है। 500 रु. से कम मूल्य के जूतों पर पांच प्र.श. जीएसटी लागू है। छाता भी आम आदमियों की जरूरत की चीज है और प्राय: इसकी कीमत 500 रु. से कम होती है। अत: 500 रु. से कम मूल्य के छातों पर जीएसटी की दर 5 प्र.श. होनी चाहिए। छातों पर पहले शून्य से छह की दर से वैट और छह प्र.श. की दर से वैट और छह प्र.श. सेन्ट्रल एक्साइज डय़ूटी लागू थी। 96 प्र.श. अधिक छाता निर्माता इकाइयों का वार्षिक टर्नओवर 1.5 करोड़ से भी कम होने के कारण इन्हें एक्साइज से मुक्ति प्राप्त थी। फलत: छातों के स्थानीय उत्पादन को प्रोत्साहन देने हेतु जीएसटी की दर घटाना आवश्यक है। इसके अलावा आयात किए जाने वाले हल्के दर्जे के छातों में अंडर इन्वाइसिंग की बुराई को दूर करने के लिए भी जीएसटी की दरें घटाना जरूरी है।
चोपड़ा ने कहा कि जीएसटी रूल्स के अंतर्गत छाते के पुराने स्टाक पर इनपुट क्रेडिट केवल छह महीने तक ही मिलती है। छाता सीजनल उद्योग है यदि मानसून विफल हो जाए तो छाते की बिक्री भी प्रभावित होती है। और अनबिका माल अगले मानसून तक रखना पड़ता है। इस प्रकार छाता उद्योग की इनपुट क्रेडिट की मियाद बढ़ाकर 12 माह करना चाहिए।

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