राजर्षि की सलाह

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कार्यक्रम में उपस्थित रहने के आमंत्रण को स्वीकारा उसी दिन से राजनैतिक हलकों और मीडिया में विवाद शुरू हो गया। दसकों से कांग्रेस पक्ष में रहने के बाद एवं अधिवेशनों और संसद में आरएसएस के आंतकवाद पर सख्त वाक्प्रहार करने के बाद अब प्रणवदा आरएसएस के समारोह में कैसे शामिल हो सकते हैं? अलबत्ता ये आलोचक यह भूल जाते हैं कि प्रणव  मुखर्जी कांग्रेस या अन्य किसी राजनैतिक पक्ष के नहीं बल्कि राष्ट्र के हैं। राजनैतिक नेता नहीं, राष्ट्रपुरुष हैं। आपको सुनने के बाद यह स्वीकारना लाजिम है कि वे अब एक `राजर्षि' के अवतार में है।
कांग्रेस व भाजपा-आरएसएस को ही नहीं समग्र राष्ट्र को उन्होंने संदेश दिया है: विविधता में राष्ट्रीय एकता का और एकता के संवाद का! नागपुर में हाजिर रह कर उन्होंने यह संदेश दिया है कि राजनीति में और राष्ट्र में कोई अस्पर्श्य नहीं है। पतीस मिनिट के अपने प्रवचन में उन्होंने कभी भी आरएसएस का उल्लेख नहीं किया लेकिन राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रवाद की नेहरू की व्याख्या का हवाला दिया। राष्ट्रवाद को `धर्म, भाषा, प्रदेश में संकुचित नहीं किया जा सकता। असहिष्णुता राष्ट्र की पहचान का अवमूल्यन करती है यह समझाने के साथ ही उन्होंने आरएसएस के संस्थापक डा. हेडगेवार भारत माता का महान सपूत बनाते हुए आदरांजलि भी दी। इस प्रकार उन्होंने सिर्फ `संतुलन' साधने का प्रयास ही नहीं किया बल्कि कांग्रेस और भाजपा के नेताओं को स्पष्ट संदेश भी दिया है।
नागपुर मुलाकात के पहले विवाद ने जिस प्रकार तूल पकड़ा उसमें उनकी पुत्री, कांग्रेस की प्रवक्ता ने भी उनको रोकने का प्रयास किया। सोनियाजी के राजनैतिक सचिव अहमदभाई पटेल ने भी कहा, `प्रणवदा हमको आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी'. प्रणवदा को सुनने के बाद सबको यह विश्वास हो गया है `सहिष्णुता -एकता की सलाह आरएसएस को ही है - आईना बताया है। उल्लेखनीय है कि प्रणव मुखर्जी स्पष्ट वक्ता के रूप में प्रसिद्ध हैं। श्रोता क्या सुनना चाहते हैं वह नहीं किंतु क्या सुनना चाहिए - यह महत्वपूर्ण है और उन्होंने कांग्रेस व आरएसएस का नाम लिए बिना बहुत कुछ कह दिया।
पूर्व राष्ट्रपति ने राष्ट्रपिता के शब्दो का उल्लेख किया राष्ट्रवाद किसी धर्म या जाति से बंधा हुआ नहीं है और भारत का राष्ट्रवाद आक्रामक भी नहीं है। ``जवाहरलाल नेहरू ने भी हिन्दु, मुस्लिम, शिख और भारत के अन्य सभी वर्ग़ों के संवाद और सूर से राष्ट्रवाद का जन्म होता है।'' इस प्रकार उन्होंने राष्ट्र, राष्ट्रवाद, सेक्यूलरवाद, भक्ति के अलावा सहिष्णुता का स्पष्ट संदेश दिया है।
प्रणवदा को सुनने के बाद कांग्रेस के नेताओं ने राहत की सांस ली है। उन्हें आरएसएस को आइना दिखाने की बात से खुशी हुई है तो साथ ही अस्पृश्यता नाबूदी व संवाद का संदेश भी है।
संघ का संबंध है वहां तक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने भी प्रणव मुखर्जी से पहले ही अपने प्रवचन में स्पष्टता की थी कि राष्ट्र की प्रगति के लिए हम सब के विचार जानने के लिए सदा तत्पर रहते हैं।
``विविधता को स्वीकार करते हुए सब को अपनी विचारधारा का अनुसरण करने की अनुकूलता हो और यह अपनी संस्कृति या विचारधारा भिन्न  हो तो भी अंतिम ध्येय भारत को एक शक्तिशाली राष्ट्र बनाना ही हो। आखिरकार हम सब भारतमाता की संतान ही हैं... भारत में सब के साथ भाईचारे में हमारा दृढ़-अटल विश्वास है न कि अन्य के तिरस्कार में। डीएनए के प्रमाण है कि 40,000 वर्ष पूर्व हमारे पूर्वज भारतीय ही थे। संघ के संस्थापक डा. केशव बलीराम हेडगेवार भी कांग्रेस के कार्यकर्ता थे और स्वातंत्र्य संग्राम के दौरान दो बार जेलवास भी भोगा था। राष्ट्र निर्माण के लिए उनका जीवन समर्पित था।''
प्रणव मुखर्जी के प्रचवन में संघ की विचारधारा-नेशन फर्स्ट-राष्ट्र पहले का प्रतिघोष होना संघ मानता है। लोकतंत्र व सब के विकास की भावना अपने राष्ट्रवाद की बुनियाद है। ऐसा स्वीकार्य केद्रीय मुद्दा है। संघ अथवा भाजपा को भी संतोष होना चाहिए कि प्रधानमंत्री जो ``सबका साथ, सबका विकास'' पर जोर दे रहे हैं वही बाद पूर्व राष्ट्रपति ने गांधीजी व नेहरू के शब्दों में कही है। असहिष्णुता पर जोर दिया है लेकिन अब इस शिकायत का प्रमाण कम हो गया हो, गौरक्षकों के नाम से अत्याचार हुए पर प्रधानमंत्री द्वारा सार्वजनिक रूप से सबको सख्त चेतावनी दी और राज्य सरकारों को भी ताकीद की उसके बाद ये घटनाएं बंद हो गई है फिर भी दलित भाईयों के सम्मान पर चोट पहुंचे और अपमान हो ऐसे समाचार आते रहते हैं। यह भी असहिष्णुता का एक प्रकार है। अलबत्ता, इसकी जड़ें राजनैतिक है और राजनैतिक असहिष्णुता ने तमाम मर्यादाओं को तोड़ दिया है। प्रणवदा ने इस विषय को स्वाभाविक ही है कि छेड़ा नहीं है फिर भी नेताओं को इस बारे में गंभीरता से सोच विचार करना जरूरी है प्रणव मुखर्जी-राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आमंत्रण स्वीकारें, उसका विरोध हो- क्या यह असहिष्णुता नहीं है? पूर्व उपराष्ट्रपति हमीद अंसारी वामपंथी पीएफआई (पाप्युलर फ्रंट आफ इंडिया) के मंच पर तो उनका विरोध क्यों नहीं हुआ?
प्रणवदा के प्रवचन का विष्लेषण और मीमांसा हर कोई अपने मत एवं मति के अनुसार करेंगे लेकिन राष्ट्रीय दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत में भाषा, संप्रदाय रीति-रिवाज, उत्सव, भोजन प्रदेश, प्रत्येक बात में विविधता है- विश्व के अन्य किसी देश में ऐसी विविधता में एकता देखने को मिलती नहीं है। विदेशी आक्रमण अथवा कुदरती आपदा के समय हमारी एकता दृढ होती है तो फिर विकास के लिए क्यों नहीं? इस एकता संबंधी विवाद दूर करने के लिए संवाद अनिवार्य है। द्विपक्षीय संवाद, बोलने का अधिकार और सुनने की फर्ज ऐसे संवाद की सलाह प्रणवदा ने दिया है। चुनाव के समय नेताओं का हुज्जत-अपमानजनक भाषा बंद हो और शिष्ट भाषा में संवाद हो तो समाधान का मार्ग खुले पर अन्योन्य के लिए मान-सम्मान अनिवार्य है। इस संदर्भ में नागपुर मुलाकात का मूल्यांकन की आवश्यकता है। पूर्व राष्ट्रपति ने यह सलाह देने से पहले स्वयं अमल करके दिखाया है और अश्पृश्यता को छोड़ संवाद की पहल करने की बात समझाई है। इस समय देशकाल की वर्तमान व संभावित स्थिति के अध्येता व अनुभवी प्रणव मुखर्जी जानते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर राजनीति प्रेरित आरोप लगे हैं। कामचलाऊ प्रतिबंध व नियंत्रण भी लगाए गए हैं। अतीत में चीनी आक्रमण के बाद नेहरू ने गणतंत्र दिन की परेड में शामिल होने के लिए संघ को आमंत्रण दिया था। महात्मा गांधी, जयप्रकाश नारायण, उपराष्ट्रपति डा. जाकीर हुसैन और लालबहादुर शास्त्री संघ के कार्यक्रम में शामिल हुए थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की शक्ति और अनुशासन से सभी सुपरिचित हैं। राष्ट्रभक्ति उसकी शक्ति है। ऐसे में पूर्व राष्ट्रपति ने –निवृत्ति के बाद आमंत्रण स्वीकारा वह पूरी समझदारी और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी के मद्देनजर स्वीकारा था। उनके इस फैसले की आलोचना-निंदा पूर्व राष्ट्रपति का अनादर है। अलबत्ता वे अपने निर्णय पर अडिग थे। अब उन्होंने मार्ग दिखाया है। पगडंडी नहीं- राजमार्ग खोल दिया है। अब देखना है कि नेतागण संवाद के मार्ग पर चलते हैं कि विखवाद के।           

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