यार्न बाजार में कारोबार कमजोर : आर्थिक संकट गहराया

यार्न बाजार में कारोबार कमजोर : आर्थिक संकट गहराया

गणपत भंसाली
सूरत। स्थानीय आर्ट सिल्क कपड़ा व यार्न बाजार में कमजोर कारोबार के चलते परिस्थितियां बहुत ही विकट बनती जा रही हैं, नित्य घटते कारोबार के चलते कपड़े व यार्न किस्मों में पूछ परख बड़ी ही कमजोर चल रही हैं, दूसरी ओर बाजार में वितीय संकट दिन ब दिन बढ़ता ही जा रहा हैं, हालात इस तरह के बन गए हैं कई-कई दशकों से आपस में कारोबार कर रहे यार्न व कपड़ा व्यापारियों के बीच अब अविश्वास का वातावरण बनता जा रहा हैं, ऐसा इसलिए कि जीएसटी प्रावधान लागू हो जाने के पकाात कपड़े व यार्न में कारोबार घट कर 50 से 60 प्रतिशत तक रह गया हैं, अत: कपड़ा व यार्न व्यापारियों का चलता बिजनेस कमजोर पड़ जाने से उन्हें लम्बा आर्थिक नुकसान लग सकता है, अत: उधारी में कपड़ा व यार्न बेचने वाले अब पूर्ण सतर्कता बरत रहे हैं, ताजा घटना क्रम में टेक्च्युराइज्ड एसोशिएशन ने उधारी में यार्न खरीदने वाले विवरों से ब्लेंक चेक एडवांस में लेने का फरमान निकाला हैं। इस तरह के कठोर निर्णय लेने के पीछे विवर्स का निरन्तर कमजोर पड़ जाना हैं, टेक्च्युराइज्ड लॉबी का तर्क है कि कमजोर कारोबार के चलते विवर्स आर्थिक रूप से कमजोर पड़ता जा रहा हैं, इन हालातों में विवर अपने कारखाने अन्य विवरों को किराया पर दे देते हैं, जब बकाया रकम का तकादा करने टेक्च्युराइजर या यार्न व्यवसायी आदि उस पॉवरलुम्स कारखाने पर पहुंचते है तो  पता चलता हैं कि जिस विवर को उधार में यार्न दिया था वो तो अपना कारोबार समेट कर अन्य किसी व्यापार में जुड़ गया हैं तथा उसका कारखाना कोई अन्य जॉब करने वाले विवर को किराए पर दे रखा हैं, ऐसे हालातों के चलते टेक्च्युराइजरों ने ये निर्णय लिया हैं। गत दिनों साउथ गुजरात टेक्च्युराइजर वेलफेयर एसोशिएशन की एक मीटिंग में यह तथ्य उभर कर आया कि  विवर्स व यार्न डीलर्स का बकाया भुगतान समय पर नहीं मिल रहा, अत: कुछ ठोस कदम उठाए जाएं,  मीटिंग में कुछ टेक्च्युराइजरों ने पेमेंट डूबने की भी आप बीती बताई, इस समस्या के स्थाई हल हेतु मीटिंग में लम्बी चर्चा-मंत्रणा भी हुई, अंतत: आम सहमति से यह तय हुआ कि विवरों, यार्न डीलरों आदि को उधारी में माल तब दिया जाए जब उनके ब्लेंक चेक उस उधारी के समक्ष मिलने लग जाये, एशोशियेशन के अध्यक्ष मुरारी श्रॉफ ने बताया मीटिंग में यह सर्वसम्मति से तय किया गया कि बकाया पेमेंट क। अमानत के रूप में ब्लेंक चेक लिया जाएगा,  सराफ ने कहा कि बाजार में बकाया पेमेंट तीन-तीन व चार-चार माह तक नहीं मिल पाता। इस कारण पूंजी को सुरक्षित करने के उद्देश्य से यह निर्णय लिया गया, सराफ ने यह भी बताया कि अतीत में जीएसटी कानून अमल में नही था तब विवर्स व यार्न डीलर आदि एक से अधिक फर्मो के होने से अलग-अलग चेक मिल जाते थे, अब जबसे जीएसटी अमल में आया है तब से एक ही फर्म के एकाउंट से चेक मिल रहे हैं, अत: अब यह तय कर दिया गया हैं कि उधारी में यार्न खरीदने वाले व्यापारी व विवर्स को सिक्युरिटी के लिहाज से ब्लेंक चेक देने होंगे, जबकि नगद में यार्न खरीदने वालों पर यह नियम लागू नहीं होगा, यह उल्लेखनीय हैं कि टेक्च्युराइजरों द्वारा बनाये गए कड़क कायदे पहली बार लागू होने नहीं जा रहे है, अतीत में भी बकाया रकम पर 18 प्रतिशत ब्याज वसूलने का भी नियम बनाया था, लेकिन उस नियम की भी पालना नहीं हो पाई थी, बताया जाता हैं कि टेक्च्युराइजरों को कच्चा माल आपूर्ति करने वाले स्पिनर भी बकाया पेमेंट के पेटे में ब्लेंक चेक लेते हैं, बहरहाल इस कठोर निर्णय के पालना होने की संभावना अलबता संदिग्ध ही हैं, हां जब तक यार्न में डिमांड है तथा भाव वृद्धि का एक तरफा दौर जारी है तब तक आंशिक व अस्थाई रूप से इसकी पालना हो सकती हैं, लेकिन यार्न में सप्लाई अधिक व लेवाली कमजोर रही तो फिर तो कायदे-कानून विवरों के ही मान्य रहेंगे, प्रश्न यह भी हैं कि इन नियमों के अनुरूप सभी टेक्च्युराइजर भी तो चलने चाहिए, तथा तमाम विवर्स व डीलर एक तरह की गुडविल के तो होते नही, कई विवरों व डीलरों की बाजार में अपनी पैठ है तो यह कैसे सम्भव है कि ऐसे विवर्स डिपॉजिट के रूप में ब्लेंक चेक दे देंगे? बहरहाल समय बताएगा कि यार्न बाजार का ऊंट किस करवट की ओर बैठेगा?

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