अविश्वास बनाम विश्वास

लोकसभा में अविश्वास के प्रस्ताव पर चर्चा भले होती रहे- प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी को तो लोगों- जनता पर विश्वास है। जनता जानती है कि राष्ट्रहित और विकास सेवा के लिए कौन काम करता है और सत्ता के लिए कौन लड़ता है। 
लोकसभा में जब सरकार में अविश्वास दर्शाने वाला प्रस्ताव आए तब उसके पीछे व्यूह- गणित शासक पक्ष की शक्ति परखने के साथ विपक्ष भी अपनी शक्ति और एकता मापना और बताना चाहता है। इस शक्ति प्रदर्शन का महत्व संसद के बाहर- लोकसभा चुनाव के लिए विशेष होता है। चुनाव प्रचार का मुद्दा- का प्रीव्यू पूर्व समीक्षा इस प्रस्ताव की चर्चा के दौरान होती है। विपक्ष को सरकार पर आलोचना प्रहार और आरोप लगाने का मौका मिलता है तो सरकार को अवसर मिलता है- जवाब देने का। लोकसभा में शुक्रवार को चर्चा के बाद मतदान में सरकार अपना बहुमत साबित करेगी। इस पर शंका ही नहीं है। देखना यह है कि एनडीए एक रहता है कि नहीं- और महागठबंधन- मजबूत होता है कि नहीं- शिवसेना नरेद्र मोदी सरकार के साथ ही है। अन्ना डीएमके का मतभेद उभर कर आया और शत्रुघ्न सिन्हा भी सरकार के पीछे खड़े रह गए... कुछ क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस के साथ- कांग्रेस की अर्थात राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार करती है यह जानने को मिलेगा। मायावती और अखिलेश ने सोनिया जी और राहुल गांधी के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त किया है लेकिन वह ``हाथी का कौन सा दांत है? खाने वाला- या दिखाने वाला?'' समय आने पर पता चलेगा।
सरकार में अविश्वास दर्शाने वाला प्रस्ताव अप्रैल महीने में पेश करने की अनुमति स्पीकर महोदया ने नहीं दी थी क्योंकि  गृह में शोर-शराबा था। इस बार विपक्ष की ओर से अनेक प्रस्तावों की नोटिस मिली लेकिन प्रथम नोटिस तेलुगुदेशम की होने से स्पीकर ने उसे स्वीकारा और समस्त विपक्ष के सदस्यों द्वारा समर्थन दिए जाने से प्रस्ताव पेश करने की मंजूरी मिली। सरकार ने भी तत्काल- शुक्रवार को ही चर्चा और मत लेने की मंजूरी दी जिससे विपक्ष सहित सभी क आकार्य हुआ लेकिन प्रधानमंत्री ने तत्काल मंजूरी देकर प्रस्ताव पर चर्चा होने से पहले ही आत्मविश्वास प्रदर्शित किया है। 
इस प्रस्ताव के बाद ऐसी आशा रखी जा सकती है कि अब लोकभसा की कार्यवाही सभी के सहयोग से चलेगी। प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने अवसर का लाभ ले लिया है- चर्चा के दौरान विपक्षी वक्ता किसानों की आत्महत्या, समूह द्वारा हत्याएं, दलितों की शिकायत और संविधान खतरे में है, सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्तियों का हवाला दिया जाना अपेक्षित था। विपक्ष का मुद्दा जगजाहिर है और प्रधानमंत्री का जवाब- मुस्लिम महिलाओं को इन्साफ, तीन तलाक, हलाला, मदरसों में शिक्षा सुधार तथा सहायता भी अपेक्षित थी। प्रधानमंत्री के सभी आरोपों का सटीक जवाब देने के लिए तैयार होने का भरोसा सभी को था।
देखना यह है कि चर्चा के दौरान दोनों पक्ष किस तरह के वक्ताओं को मैदान में उतारते है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के महागठबंधन की अगुवाई करने में सक्षम है, ऐसा बताने के लिए तत्पर हों यह स्वाभाविक है। सरकार की ओर से राजनाथ सिंह, रविशंकर प्रसाद, रामविलास पासवान मुख्य वक्ता साबित हुए है।
वाजपेयी की सरकार के समक्ष 2003 में सोनिया गांधी ने अविश्वास का प्रस्ताव पेश किया था जो उड़ गया था। डा. मनमोहन सिंह की यूपीए (2) सरकार के खिलाफ एक भी अविश्वास का प्रस्ताव आया नहीं था।

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