कपास की फसल को रोगमुक्त करने हेतु मट्ठे का उपयोग

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मुंबई। तमिलनाडु एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने संशोधन किया है कि पौधे की वृद्धि के लिए उपयोग होते वेसिलस एमिलोलिक्विफेसियेन्स के रूप में जानी जाती रिजोवैक्टिरिया (रूट कोलोनाइजिंग वैक्टिरिया) कपास की फसल को लागू होते टोबैको स्ट्रीक वायरस (टीएसवी) के सामने सुरक्षा प्रदान करती है। मठ्ठे में बनाये गये मिश्रण को कपास के पौधे पर उपयोग करने से यह किमियो असरकारक साबित हुआ।
किटाणु के नाश के लिए मानवीय तथा वनस्पति दोनों पर मठ्ठे का उपयोग परंपरागत रूप से हो रहा है। दूध के अनेक प्रोटीन्स में एंटीवायरस गुण मिला है। नए संशोधन में भी मात्र मठ्ठे द्वारा भी कीटाणुओं की मात्रा घटायी जा सकती है। लेकिन इसके साथ ही जो बेसिलस मिलाया जाता है वह अत्यन्त असरकारक होता है।
टीबीएसवी के कारण कपास में क्षय रोग लागू होता है जो किसानों के लिए बड़ी समस्या है। रिसर्च टीम के वैज्ञानिक एस. विनोद कुमार ने बताया कि वनस्पति के वृद्धिकारक रिजोवैक्टिरिया को मठ्ठे में मिलाकर प्रभावित पौधे पर छिड़काव करने से बिमारी दूर होती है और वृद्धि तथा उपज भी बढ़ती है। किसान सरलता से उपयोग कर सकें ऐसा उत्पादन करने वाले फार्मूलेशन को सुव्यवस्थित स्वरूप देने की जरूरत है। दूसरी तरफ देश में कपास की पैदावार लेने वाली क्षेत्रों में भी इसका प्रयोग आवश्यक है।
रिसर्च टीम में विनोद कुमार के अलावा एस. नक्कीरन, पी. रेणुका देवी, सेंटर पोरप्लांट प्रोटेक्शन स्टडीज के वी.जी. मालाधी तथा सेन्टर फार प्लांट मोलेक्युलर वायोलाजी एंड वायोटेक्नोलाजी के एस. मोहनकुमार शामिल थे।

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