विजय माल्या विवाद : `नोट'' के लिए या वोट के लिए?

वर्ष़ों पहले प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासन में बोफोर्स तोप का सौदा विवादास्पद बना था। सोनियाजी के संबंधी- बहनोई- इटालियन कवोट्रोची `दलाल' थे और करोड़ों रुपए का विवाद उठा था। जांच के दौरान कवोट्रोची विदेश पलायन कर गया और भारत की राजनीति में यह विवाद अपूर्ण रहा। कवोट्रोची की तो अब मृत्यु हो गई है लेकिन बोफोर्स तोप पाकिस्तानी सीमा पर- जरूरत पड़ने पर गरजती है। समय-समय पर राजनीति में भी बोफोर्स तोप की गर्जना सुनाई देती है। नरेद्र मोदी की सरकार आई तब से कांग्रेस के नेता रक्षा में सौदा- कांट्रैक्ट हो तब विवाद की ताक में थे। फ्रांस से राफेल फाइटर विमानों की खरीदी में शंका की चर्चा- विवाद शुरू हुआ है तभी अब विजय माल्या का नया मुद्दा राजनीति में उठा है! 
विजय माल्या को किसने भगा दिया ? रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने संसदीय समिति की मांग के जवाब में सत्तर पृष्ठ का जवाब भेजा है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बैंकों को चुना लगाकर लोन लूटने की शुरुआत यूपीए के शासन में हुई थी और प्रधानमंत्री का ध्यान खींचा गया था- पर आज तक (एनडीए के शासन में भी) कौन से कदम उठाए गए उसकी जानकारी नहीं है- गवर्नर थे तब राजन ने टिप्पणी भी की थी कि बैंकों के 5000 करोड़ रु. (ब्याज सहित 9000 करोड़ रुपए) जेब में डालकर गोवा के समुद्र तट पर जन्मदिन मना रहे थे तब बैंकों के मैनेजर हाथ में चेकबुक लेकर `माल्या जी' मांगे उतना लोन देने के लिए उनके पीछे दौड़ते थे... यह किसकी `कृपादृष्टि' थी?    
रघुराम राजन ने सिर्फ `टेलर' दिखाया है- यदि और जब ज्यादा जानकारी दें तब कैसा धमाका होगा? डा. मनमोहन सिंह राजन के लिखित बयान का खंडन करेंगे? इस प्रश्न को दरकिनार करने के लिए अब नया मुद्दा उठाया गया है। संसद भवन में विजय माल्या वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिले तब क्या हुआ? कांग्रेस ऐसा बताना चाहती है कि जेटली की `मंजूरी' लेकर माल्या भाग गए है जबकि जेटली ने जवाब दिया है कि सेन्ट्रल हाल में दौड़ते हुए- साथ हो गए फिर भी मैंने उनसे कहा कि जाकर बैंक मैनेजरों से मिलें- मुझसे नहीं।
मूल प्रश्न वित्त- अरबों रुपया वापस प्राप्त करना है लेकिन उसे दरकिनार कर राजनीतिक विवाद- वित्त मंत्री पर आरोप लगाकर ध्यान वहां खींचा जा रहा है! राजनीतिक नेताओं की यह चालबाजी है। 
इसी बीच- विजय माल्या की किंगफिशर एयरलाइन्स के साथ गांधी परिवार के संबंध और प्रधानमंत्री को लिखे पत्र मीडिया में आए है। हमारे नेता सीधी बात नहीं समझते कि एक झूठ छिपाने के लिए हजार झूठ बोलने पड़ते है।
पांच राज्यों के विधानसभाओं के चुनाव के बाद लोकसभा के चुनाव- 2019 में होने वाले है। लोकसभा का चुनाव साथ-साथ होने की संभावना अब कम है। भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर अब लोकसभा पर है और जिससे तैयारी हुई है। कांग्रेस के नेता राफेल विमान, विजय माल्या तथा नीरव मोदी और मेहुल चोक्सी के मुद्दे पर दारोमदार रखते है जबकि नरेद्र मोदी सरकार भगोड़ा अपराधियों को भारत लाने का प्रयास कर रही है और दूसरी ओर जन कल्याण के आर्थिक कदम तेजी से उठा रही है। 
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में से करोड़ों रुपए के लोनों के लिए जिम्मेदार कौन है? कांग्रेस के नेता अभी तक आरोप लगाते रहे है कि मोदी सरकार ने इन लोगों को भगाया- अथवा भागने दिया है। अब रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने संसदीय समिति को सापी गई रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से कहा है कि वर्ष 2006 से 2008 के दौरान बैंकों द्वारा पूरी जांच किए बगैर लोन दिए गए थे और उन्होंने- (राजन ने) प्रधानमंत्री तथा उनके कार्यालय को इस बारे में बताकर ध्यान खींचा था लेकिन जरूरी कदम नहीं उठाए गए। अब सरकार और भाजपा के नेतओं ने पलटकर आरोप लगाया है कि यूपीए सरकार के शासन में बैंकों की अंधाधुंध लूट होना स्पष्ट है। अब पूर्व प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह और चिदंबरम को स्पष्टीकरण करना जरूरी है। भ्रष्टाचार के मूल तक पहुंचा जाएगा? 
इसी बीच विजय माल्या ने लंदन की अदालत के बाहर पत्रकारों के समक्ष ऐसा `धमाका' किया कि भारत छोड़ने से पहले म वित्त मंत्री अरुण जेटली से मिला था और बैंकों का वित्त अदा करने की बात की थी। रिपोर्ट आते ही कांग्रेस के नेता जोश में आ गए कि सरकार ने ही विजय माल्या की मदद की है।  
जेटली पर आलोचना प्रहार शुरू हुआ तब उन्होंने स्पष्टीकरण किया कि `संसद भवन में- राज्यसभा से मैं मेरे संसदीय कार्यालय में जा रहा था तब माल्या ने मेरे पीछे आकर वित्त अदा करने की बात की और मैंने जवाब दिया कि अपने बैंकों के पास जाए। मैंने उनके कागजों को भी हाथ में लिया नहीं था...' यह खंडन दिए जाने के बाद लंदन में माल्या ने फिर से कहा कि औपचारिक मुलाकात नहीं हुई थी!
कांग्रेस के नेता-राहुल गांधी सहित सभी जानते है कि संसद भवन में प्रधानों की आवाजाही में कभी भी उनसे `टकराया' – मिला जा सकता है और माल्या तो राज्यसभा के सदस्य थे।
विजय माल्या की भारत-वापसी के बारे में लंदन का न्यायालय दिसंबर में फैसला देगा। इस बीच नीरव मोदी और चौकसी को भी भारत लाने के प्रयास हो रहे है।
इसी बीच प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने पेट्रोल-डीजल के बढ़ते भाव और रुपये के घटते मूल्य के संबंध में जरूरी कदम उठाने की शुरुआत की है दूसरी ओर 1,67,681 करोड़ रुपये की कल्याण योजनाएं घोषित की है जिसका लाभ सिर्फ किसानों को ही नहीं गरीब-मध्यम वर्ग को भी मिलेगा। किसानों को उनके किसी उत्पादों का उचित भाव मिले उसके लिए सरकार की ओर से निजी व्यापारी भी खरीदी कर सकेंगे। यह योजना प्रायोगिक आधार पर लागू की जा रही है। दलहन, तिलहन तथा सोयाबीन और दूध के भारी उत्पादन के फलस्वरूप उत्पादकों को प्रतिफल नहीं मिलता जिससे यह निर्णय लिया गया है। 24 खेत उत्पादकों के लिए न्यूनतम खरीद भाव निश्चित किया गया है लेकिन पिछले दो वर्ष से उत्पादन बढ़ने से इन उत्पादों का भाव टूटने के कारण कृषि क्षेत्र में संकट पैदा हुआ है। जुलाई महीने में 14 उत्पादों का न्यूनतम भाव बढ़ाया गया ताकि किसानों को डेढ़ गुना प्रतिफल मिल सके। मध्यप्रदेश में `भावांतर' योजना के तहत किसानों को यदि औसत से कम भाव मिलता हो तो न्यूनतम भाव और बाजार भाव के बीच का फर्क-घाटा सरकार पूरा करती है। यह योजना अब राष्ट्रीय बन रही है।
इसके अलावा तीसरी योजना के तहत निजी व्यापारी न्यूनतम भाव पर खरीदी कर, सरकार की ओर से गोदामों में रखेंगे। सरकार इसके लिए न्यूनतम भाव पर 15% सर्विस चार्ज अदा करेगी। प्रायोगिक आधार पर तिलहन की खरीदी होगी। इससे संबंधित नियम शीघ्र घोषित होंगे।
अधिकृत सूचना के अनुसार `नाफेड' द्वारा 63.4 लाख टन दलहन और तिलहन खरीदा गया है। वर्ष 2010 से 2014 के दौरान ऐसी खरीदी पर 3500 करोड़ रु. खर्च किए गये थे और इस समय यह रकम 10 गुना- 34000 करोड़ रु. हुई है।
मोदी सरकार कृषि क्षेत्र की आबादी पर पूरा ध्यान और शक्ति लगा रही है।

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