अर्थतंत्र में आग : राजतंत्र में ज्वाला

अर्थतंत्र में भारी उथल-पुथल हो रही है। शेयर बाजार मानो उल्टे सिर है। व्यापारी वर्ग को निराशा है। प्रश्न यह है कि सरकार द्वारा पेट्रोल-डीजल में अधूरी राहत देने के स्थान पर पूरी राहत देना जरूरी है। आयल कंपनियों का बोझ बढ़ाने के स्थान पर सरकार यह भार उठा सकती है।
चुनाव के पहले भाजपा ने सुरक्षात्मक कदम उठाना शुरू कर दिया है। `पानी से पहले बांध' बना रही है जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की आक्रामक चाल अब धीमी पड़ी है! मायावती और शरद पवार- दोनों नेताओं ने कांग्रेस को उलझन में डालने की शुरुआत कर दी है। फलस्वरूप महागठबंधन के स्वप्न के सामने सवाल उठ रहा है।
प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी के सामने जो चुनौतियां है उसमें मुख्यत: राफेल विमानों का विवाद और अर्थव्यवस्था-पेट्रोल-डीजल के बढ़ते भाव, रुपये की कीमत में निरंतर गिरावट है। पेट्रोल डीजल के अंतरराष्ट्रीय भाव 100 डालर से ऊपर पहुंचने की अटकलें हो रही है तब सरकार की चिंता समझी जा सकती है। केद्र और राज्य सरकारों को पेट्रोल-डीजल के कर से भारी आय होती है। गैर भाजपायी- बंगाल और कर्नाटक द्वारा पेट्रोल-डीजल के भाव में प्रति लीटर 1 रु. की कमी किए जाने के बाद भाजपा पर आलोचना- प्रहार हो रहा था परंतु वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा कर में ढाई रुपया और भाजपा शासित 12 राज्य सरकारों द्वारा भी ढाई रुपया घटाने से लोगों को प्रति लीटर 5 रु. की राहत मिली है इस कदम के फलस्वरूप अपनी आयल कंपनियों की `रेटिंग' में गिरावट आयी है लेकिन सरकार को अपनी लोकप्रियता की रेटिंग्स पर भी विचार करना पड़ेगा! यह राहत देर से दी गयी और कम है ऐसी आलोचना भी अपनी जगह है! शासक-विपक्ष सभी को लोगों पर पड़ने वाली भाव वृद्धि पर विचार करना पड़ेगा।
फ्रेंच कंपनी के पास से राफेल जेट विमान खरीदने के कांट्रैक्ट का विवाद गंभीर बन रहा था। राहुल गांधी के हाथ में `एटमबम' आ जाने की छाप पड़ती थी। सरकार ने भी आक्रमण रोकने और प्रतिकार करने के लिए तत्काल कदम उठाया। इतना ही नहीं बल्कि राष्ट्र के हित में अधिक सुरक्षा तैयारी और अस्त्र-शस्त्र की व्यवस्था हो रही है। रशिया के प्रमुख पुतिन का नई दिल्ली दौरा महत्वपूर्ण है। पाकिस्तान और चीन के सामने सुरक्षा की मजबूत दिवाल खड़ी हो रही है। यह निश्चित है कि चुनाव प्रचार में नरेद्र मोदी कांग्रेस के आलोचना-प्रहारों का जवाब देंगे। इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की स्पष्ट राय और राहुल गांधी को सलाह है कि प्रधानमंत्री पर चोर-महाचोर जैसे आरोप नहीं लगाने चाहिए। मौत के सौदागर की तरह ये विशेषण भी मोदी के मददगार होंगे। यह बात कुछ गले उतरी लग रही है। जिससे अब भाजपा के `भ्रष्टाचार' के अलावा किसानों की परेशानी और होते अन्याय का मुद्दा उठाने का निर्णय वर्धा में हुई कांग्रेस कारोबारी की बैठक में लिया गया है।
चुनाव की राजनीति में शरद पवार और मायावती की चाल रहस्यमयी और आश्चर्यजनक होती है। मायावती ने पहले छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का `हाथ' छोड़कर अजीत जोगी के साथ हाथ मिलाया, यह शुरुआत थी। इसके बाद अब राजस्थान, मध्यप्रदेश में भी `महागठबंधन' में नहीं जुड़ने की घोषणा की है।
इस घोषणा के बाद कांग्रेस ने भड़ास निकाली है कि मायावती ने भाजपा को मदद करने के लिए ही निर्णय लिया है, लेकिन मायावती ने अधिक सीट मांगी उसे देने के लिए कांग्रेस तैयार नहीं है। इसके लिए ही चार राज्यों तक यह घोषणा हुई है, लेकिन परिणाम देखने के बाद लोकसभा के चुनाव के लिए व्यूह निश्चित होगा। चुनाव की राजनीति में हर नेता और पार्टी अपना भविष्य केद्र में रखती है। मायावती की तरह ममता भी कांग्रेस पर दबाव डालेंगी। बहुत कम सीट देंगी तब कांग्रेस कहां जाएगी? मार्क्सवादी कांग्रेस के साथ सार्वजनिक में हाथ मिलाने के लिए तैयार नहीं है। सीताराम येचुरी फिलहाल राहुल गांधी के साथ फोटो में दिखायी नहीं देते उनके सुर में सुर भी नहीं मिलाते!
शरद पवार ने तो बयान दिया है कि लोगों को प्रधानमंत्री की नियत पर शंका नहीं है। इसके बाद स्पष्टीकरण किया कि मने समर्थन नहीं किया है इसके बावजूद प्रमाण बगैर आरोप नहीं लगाया जा सकता- मूल वक्तव्य और स्पष्टीकरण से एक ही बात स्पष्ट होती है कि पवार साहब अभी दोनों ओर पांव रखेंगे। राज्यों के परिणाम आने के बाद आखरी दांव खेलेंगे... इस समय तो महागठबंधन में अखिलेश यादव भी नहीं है। वे भी चार राज्यों में राहुल गांधी का खेल-शक्ति देखना चाहते है। आखिरकार क्षेत्रीय पार्टियां अपनी सत्ता और हिस्सा छोड़ने के लिए तैयार नहीं होगी...   

© 2018 Saurashtra Trust

Developed & Maintain by Webpioneer