कच्चे तेल का भाव निर्धारण अब रूस, अमेरिका, सउदी अरब के हाथों में

कच्चे तेल का भाव निर्धारण अब रूस, अमेरिका, सउदी अरब के हाथों में
इब्राहीम पटेल  
मुंबई । कच्चे तेल के तेजड़ियों अब ऐसा मानने लगे हैं कि अगले महीने वियेना में आयोजित होनेवाली ओपेक बैठक में रूस और सउदी अरब उनकी मदद करने आएंगे, लेकिन, भाव घट गए होने के बावजूद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ओपेक और सउदी अरब पर उत्पादन नहीं घटाने के लिए दबाव बढ़ा रहे है। ट्रम्प चाहते है कि सउदी अरब दुनिया को ऐसा संकेत दे कि वह उत्पादन में भारी कटौती नहीं करे, पिछले सप्ताह अमेरिकी कच्चे तेल के भाव 10 प्रतिशत घटे थे। बाजार में ओवरसप्लाई और मांग घट रही होने से डबल्यूटीआई भाव चार साल की, अक्टूबर ऊंचाई 76 डॉलर से अब तक में अंदाजन 33 प्रतिशत गिर गए है। विदेशों में तो 100 डॉलर होने की अफवाह थी, लेकिन भाव इससे विपरीत ऊल्टे कांध गिरे है। 
डबल्यूटीआई क्रूड पिछले शुक्रवार को 1 दिन में 7.7 प्रतिशत लुढ़का था, जो जुलाई 2015 के बाद की पहली घटना थी, भाव एक साल की बॉटम प्रति बैरल 50.42 डॉलर बंद हुआ था। ब्रैंट 6.1 प्रतिशत घटकर 58.80 डॉलर बोला गया था। कच्चे तेल में अब के बाद की चाल, दुनिया के तीन मजबूत सत्ताधिशों ट्रम्प, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और सउदी अरब के राजकुमार मोहम्मद बिन सुलतान के हाथ में चली गई है। इन तीनों देशों प्रत्येक 110 लाख बैरल क्रूड प्रति दिन उत्पादन करता है, जो ओपेक के संयुक्त उत्पादन से अधिक है। 
सउदी अरब को अपने इकोनोमिक लक्ष्यों को सिद्ध करने के लिए भाव घटकर 60 डॉलर से नीचे जाने के बाद, अब ऊंचे भाव चाहिए है, और उत्पादन कटौती करने की इच्छाएं भी दिखलाई है। उन्होंने अपना बजट, 80 डॉलर के ब्रेक इवन (मुनाफा-नुकसान ऑफसेट होना) भाव से निर्धारित किया है। अमेरिकी पत्रकार जमाल खासोगी की हत्या में सउदी अरब की हिस्सेदारी खुल गई होने के बाद वैश्विक बाजार में अपनी शाख कमजोर हुई है और अब ऑईल बाजार में भूमिका के विकल्प भी घटे हैं। पश्चिम के देशों में अमेरिका और सउदी अरब की मित्राचारी उल्लेखनीय मानी जाती है, लेकिन ऑईल के भाव के बारे में दोनों देश आमने-सामने पोजिशन में आ गए है। ट्रम्प कच्चे तेल के भाव नीचे किस तरह जाए उसकी फिराक में है और भाव नीचे रखने के लिए रियाध पर दबाव बढ़ाया है।
ट्रम्प ने तो स्पष्ट कह दिया है कि अपनी अर्थव्यवस्था के लिए ऑईल प्राइस नीचे रहे, वह उसकी प्रबंधकीय प्राथमिकता है। वह इस महीने से इरान के खिलाफ के पुन: व्यापार प्रतिबंध की ओर भी नरम रुख अपनाया है। ट्रम्प ने इरान के मुख्य ग्राहकों को व्यापार प्रतिबंध में से कुछ छूटछाट भी दी ही। अमेरिकी ऑईल इंडस्ट्रीज के प्राइवेट उत्पादकों के सामने सीधे अंकुश लगाने की सत्ता भी अब सीमित हुई है। लेकिन अब जब जरूरत से अधिक गति से उत्पादन बढ़ रहा है, तब ट्रम्प को भी लगने लगा है कि नीचे भाव रखने की ऐसी यंत्रणा कहां तक कारगत साबित होगी। कुछेक को तो ऐसा भी महसूस होता है कि ऐसी कमजोरी तो, विश्वसत्ता के सामने वॉशिंग्टन की सत्ता फिकी होने लगेगी। लेकिन सस्ता ऑईल और शस्त्रों के लगातार भाव निर्धारण, यह ट्रम्प के हुकम के इक्के है। हालही में मित्र देशों के साथ उन्होंने किए बार-बार के ट्विट से भी ऐसा फलित होता है। 
सउदी अरब और अमेरिका के बीच, रूस राष्ट्रपति पुतिन कहीं बैठे है, ऐसा सोचा जाए तो भी, मोस्को की स्थिति विश्व में कहीं कमजोर नहीं हो जाए उसके लिए पुतिन की नजर लगातार सीमांत मुद्दों पर ठहरी हुई है। रूस आज भी अपने अर्थव्यवस्था को मददरूप होने के लिए नैचुरल रिसोर्सिस के ऊंचे भाव मिलते रहे वैसा चाहते है, उसमें कोई शंका नहीं है। हकीकत में मोस्को ऑईल के भाव के बारे में रियाध पर कोई भी तरीके से निर्भर नहीं है और पुतिन भी ऐसा दिखला चुके है कि वह ऊंचे भाव की अपेक्षा रखकर बैठे है। वह ऐसा भी मानते है कि उनके प्रतिस्पर्धी विशेष करके अमेरिकी शेल कंपनियां बहुत गति से उत्पादन बढ़ा रही है। (यह आर्टिकल पखवाड़े जितने अल्पावधि का मार्गदर्शन करता है)।

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