राजनीतिक-आतंक

पाकिस्तानी आतंक के खिलाफ हमारे सुरक्षाबल लड़ रहे है तब अपने ही देश में ``राजनीतिक अन सिविल वार'' चल रहा है। एक लड़ाई दुश्मन के आतंक को अंजाम देने की है, तो दूसरी चुनावी जंग जीतने की सत्ता की लड़ाई है, सुरक्षाबलों को खुली छूट होने के बावजूद पाकिस्तान के साथ लड़ाई नहीं है। पाकिस्तान नागरिकों को हानि न पहुंचे उसकी सावधानी है जबकि आतंकवादी अब फिर से नागरिकों को निशाना बना रहे है। जिससे हमारे सुरक्षाबलों का और आक्रामक बनना निश्चित है और इसके साथ ही हमारे विपक्षी नेता भी व्याकुल होकर प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी पर और आक्रामक बनेंगे यह भी निश्चित है! विपक्षी `आक्रमण' से व्याकुल हुए बगैर नरेद्र मोदी दोनों मोर्चे-सीमा और राजनीतिक-उत्तर देंगे ही।
इस समय औपचारिक `लड़ाई' नहीं है। इसके बावजूद आतंक के खिलाफ का जंग लड़ाई बराबर है। इन संयोगों में देश की एकता अनिवार्य है। इसके बावजूद विपक्षी-विशेषरूप से कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी फौज प्रधानमंत्री पर अंधाधुंध-गैरजिम्मेदाराना आरोप लगाते है । यहां तक की मोदी और इमरान खान के बीच `मैच फिक्सिंग' है। चुनावी जंग में हमारे जवान क्या `प्यादा' है? उनकी बदनामी ही नहीं घोर अपमान है। ये नेता मर्यादा `लक्ष्मण रेखा' पार कर चुके है। गौरतलब है कि ऐसी आरोपबाजी की अगुवाई कांग्रेस और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार राहुल गांधी ने की है। देखना यह है कि जनता मतदाता अब कैसा फैसला देते है।
आतंक के खिलाफ जंग को चुनाव का केद्रीय मुद्दा बनाने के मूल में कांग्रेस है।            
सुरक्षाबल की कार्रवाही का प्रमाण मानकर पाकिस्तान की ही मदद की है और जिससे नरेद्र मोदी ने `भारत माता की जय' बुलाकर उसका जवाब दिया। कांग्रेसी नेता अपने जाल में, स्वयं खोदे गए गड्ढे में पड़े है। सरकार पर आरोप लगाने में सुरक्षाबलों पर `हमला किया है!
भ्रष्टाचार, रोजगार और किसान मुद्दे के स्थान पर राष्ट्र की सुरक्षा का मुद्दा केद्र में आ जाने के बाद कांग्रेस के हाथ में फिर से राफेल का मुद्दा आया है। रक्षामंत्रालय की फाइलें `गुम' हुई वह प्रधानमंत्री को बचाने के लिए है ऐसा आरोप वाहियात है क्योंकि फाइल की जानकारी का उपयोग अखबारी माध्यम द्वारा प्रधानमंत्री पर ही आरोप लगाने के लिए हुआ है! जिससे फाइल गुम करने में मोदी की अपेक्षा मोदी विरोधियों का `हाथ' होने की संभावना अधिक है। खैर- जवाब देने की जिम्मेदारी सरकार की है।
मूल तो बोफोर्स तोप के सौदे में सोनिया जी के संबंधी आक्टोवियो क्वाट्रोची का नाम आने के बाद राजीव गांधी बदनाम हुए थे, उसका बदला लेने के लिए राहुल गांधी ने राफेल पर हाथ आजमाया है लेकिन यह विवाद-आरोप चुनाव में कितना टिकता है वह तो समय बताएगा, लेकिन सुरक्षा की दृष्टि से फ्रेंच विमान जरूरी है। पाकिस्तान इस समय आधुनिक विमानों का कांट्रेक्ट करता है और हम रशियन बनावट के पुराने मिंग विमानों से मुकाबला करते है। पाकिस्तानी जनता में उसकी फौज के बारे में कोई विवाद नहीं है। सेना महाभ्रष्ट है फिर भी कोई कुछ नहीं कहता। भारत द्वारा निर्यात बंद किए जाने के बाद टमाटर का भाव 300 रु. होने के बावजूद रोना-धोना नहीं है- और हमारे नेता राफेल के नाम पर हायतोबा मचा रहे हø... इस लोकतंत्र में `राष्ट्रशाही' की भावना क्यों गायब है?
कांग्रेस ने चुनावी जंग में अपने 14 चुनिंदा उम्मीदवारों के नाम घोषित किए है। रायबरेली में प्रियंका गांधी का नाम चर्चा में होने के बावजूद सोनियाजी का नाम घोषित हुआ है। प्रियंका उम्मीदवारी करें तो रायबरेली में हाथ-पांव बंध जाएंगे और अन्यत्र प्रचार नहीं कर सकेंगी जबकि राहुल गांधी को उनकी जरूरत है। प्रचार के लिए राहुल – प्रियंका ही महत्वपूर्ण है और वे जानते है कि परिवार के लिए आखिरी दांव है जिससे किसी भी कीमत पर शक्ति प्रदर्शन अनिवार्य है। अखिलेश और मायावती के गठबंधन को भी तोड़ने का इरादा है। उत्तर प्रदेश के बाद दूसरे निशान पर गुजरात है- मोदी- शाह को चुनौती देने के लिए हार्दिक और अन्य उम्मीदवारों के नाम की घोषणा पहले ही की गयी है।
अब चुनाव कार्यक्रम घोषित होने के बाद देखना यह है कि नेताओं के शब्द-प्रचार-युद्ध में संयम बनाए रखा जाता है या नहीं। इस राजनीतिक विग्रह के कारण देश के दुश्मन को लाभ होने की चिंता हमें है- नेताओं को तो कुर्सी की चिंता है।

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