संयोग- और सूत्र भाजपा के समर्थन में

लोकसभा के चुनाव के लिए 184 उम्मीदवारों की सूची घोषित कर भाजपा ने ऊंची छलांग लगायी है। कांग्रेस और अन्य विपक्ष की छावनी में अब `महागठबंधन' की चर्चा तो क्या शब्द ही सुनाई नहीं देता जबकि भाजपा ने असम, बिहार, पंजाब और महाराष्ट्र में मुख्य सहयोगी पार्टियों के साथ समझौता कर लिया है और उत्तर प्रदेश तथा अन्य राज्यों में छोटी पार्टियों को भी शामिल कर लिया है। तीसरा, विपक्षी सदस्य-विशेषरूप से महाराष्ट्र में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस से युवा नेता भाजपा में शामिल हो रहे है। गौरतलब है कि सिनियर नेताओं के पुत्र भाजपा में शामिल हो रहे है। इन दोनों पार्टियों के प्रमुख नेताओं को विश्वास हुआ होना चाहिए कि विजय की आशा नहीं है- जिससे ही `एडवांस पार्टी' के रूप में परिवार के सदस्य भाजपा में जुड़ रहे है । इस `पार्टी बदलने' का परिणाम पहले शुरू हो रहा है अर्थात् सत्ता अथवा धन के लिए नहीं, बल्कि उनका भविष्य भाजपा में है ऐसी आशा होनी चाहिए। इसमें भाजपा को अधिक लाभ है। कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस `घर' सम्भाल नहीं सकते तो देश क्या संभालेंगे? शरद पवार महाराष्ट्र में `प्रभावी' रहे नहीं है - और दिल्ली में कांग्रेस और `आप' के बीच समाधान कराने का प्रयास कर रहे हø!
पार्टी बदलकर कांग्रेसी सदस्य भाजपा में आते है वह कांग्रेसी नेताओं पर ही प्रहार है। भाजपा के उम्मीदवारों की पहली सूची में स्पष्ट संदेश है: वयोवृद्ध नेता निवृत्त होते है और दूसरी पीढ़ी के लिए मार्ग प्रशस्त करते है। लालकृष्ण आडवाणी और मुरलीमनोहर जोशी दोनों आदरणीय है। पार्टी के विकास में उनका अमूल्य योगदान है। लेकिन अब दूसरी पीढ़ी आगे आनी चाहिए। अन्य वयोवृद्ध नेताओं में शांताकुमार, कलराज मिश्र आदि का समावेश है।
नरेद्र मोदी का वाराणसी से ही चुनाव लड़ना निश्चित था। वाराणसी के कायाकल्प के वचन का उन्होंने पालन किया है और मतदान क्षेत्र बदलने की कोई जरूरत नहीं थी। सवाल ही नहीं था जबकि राहुल गांधी अमेठी के अलावा कर्नाटक से भी खड़े रहे ऐसी सार्वजनिक मांग भी शुरू हुई है। महाराष्ट्र में नांदेड़ की सुरक्षित सीट भी उनके लिए है- हालांकि राहुल गांधी दो मतदान क्षेत्रों में खड़े रहें तो उसका असर प्रतिकूल पड़ सकता है कि अमेठी पर उनको भरोसा नहीं है अथवा उन पर अब अमेठी का विश्वास नहीं रहा!
अखिलेश और मायावती ने कांग्रेस की दोनों सीटों- रायबरेली और अमेठी में कोई उम्मीदवार खड़ा न करने का भरोसा दिया था। मानो कांग्रेस को ये सीटें दान में- भेंट देते हों! इसके बाद कांग्रेस ने अखिलेश- मायावती की सीटे `छोड़' देने की घोषणा कि लेकिन मायावती ने साफ इनकार किया और लोकसभा का चुनाव न लड़ने का इरादा घोषित किया है। हकीकत में इन दोनों नेताओं को कांग्रेस पर भरोसा ही नहीं है और जिससे कोई समझौता कर कांग्रेस को ही लाभ देने के लिए तैयार नहीं है। बंगाल में ममता ने कांग्रेस का हाथ पकड़ने से साफ इनकार किया है। इसके बावजूद अब कांग्रेस के मार्क्सवादियों के साथ सगझौता न करने से आगामी दिनों में उल्ट-पल्ट हो सकती है! बिहार में लालू प्रसाद कांग्रेस के `हाथ' पर रहें ऐसा नहीं चाहते। कुल मिलाकर तमिलनाडु में कांग्रेस को कुछ सीटे मिल सकती है और कर्नाटक में आशा है लेकिन आंध्र में चद्राबाबू तैयार नहीं है।
ये सभी विपक्ष-कांग्रेस के राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जायें ऐसा नहीं चाहते।
भाजपा का संबंध है वहां तक महाराष्ट्र पर काफी निर्भरता रखी गई है- दोनों कांग्रेस कमजोर पड़ी है। शरद पवार `मनसे' के राज ठाकरे को एक-दो सीट दिला नहीं सके और उनकी अपनी सीट भी स्थानीय नेताओं के कारण सुरक्षित न होने से चुनाव न लड़ने की घोषणा की है!
गुजरात में भाजपा सावधान है। वर्ष 2017 में विधानसभा के चुनाव के दौरान राहुल गांधी को हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवाणी-अल्पेश ठाकोर की सेवा का लाभ मिला। राहुल गांधी जनेऊधारी ब्राह्मण बने और नरेद्र मोदी के लिए गंभीर चुनौती थी लेकिन भाजपा ने सत्ता बरकरार रखी। स्वाभाविक है कि अब लोकसभा के चुनाव में भाजपा लापरवाह रहना नहीं चाहेगी। इसमें भी गांधीनगर जैसी प्रतिष्ठित सीट हाथ से दूसरी पार्टी के `हाथ' में जाए नहीं उसे देखना है। ऐसा मानना है कि अमित शाह गांधीनगर में हो तो लाभ पूरे गुजरात को होगा।
शुरुआत में आक्रामक रहे राहुल गांधी अब कमजोर पड़े है। पुलवामा के जवाबी हमले के बारे में शंका व्यक्त करने के बाद और चौकीदार चोर है- ऐसा कहने के बाद मोदी ने असरकारक जवाब दिया है और पूरे देश में चौकीदार की आवाज जगायी है। पांच वर्ष पहले ``चायवाला'' ने चुनाव जीता था अब तो चौकीदार का अवतार है। इसके साथ ही लंदन से नीरव मोदी के गिरफ्तारी की खबर आयी है तब इस भगोड़े को भारत को सौपे जाने की आशा बढ़ी है।
संयोग और सूत्र नरेद्र मोदी को आक्रामक तथा लोकप्रिय बना रहे है।
इसी बीच-जन-धन खातों की संख्या और बैलेंस में भारी वृद्धि हुई है। जन-धन खाता 32 करोड़ से बढ़कर 35 करोड़ हुआ है और कुल बैलेंस अगस्त 2018 के 81224 करोड़ रु. से बढ़कर 94617 करोड़ रु. हुआ है। यह उल्लेखनीय वृद्धि किस तरह हुई? उसकी जांच हो रही है।  

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