इलेक्ट्रॉल बांड : दान देने वाले होंगे भयभीत

सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉल बांड खरीदने वालों के नाम उसे 30 मई तक देने का अंतरिम आदेश देकर सरकार और अनामीदाताओं को बड़ा झटका दिया है। अदालत ने 30 मई तक में सील बंद कवर में सभी दाताओं के नाम और उनके द्वारा दिए गए दान का विवरण देने का आदेश सभी राजनीतिक पार्टियों को दिया है। अदालत यह देखना चाहता है कि 2 जनवरी 2018 से लागू इलेक्ट्रॉल बांड की योजना के अमल के बाद आयकर, चुनाव संबंधित और बकिंग कानूनों में सुसंगत बदलाव किया गया है या नहीं। अदालत का तर्क विचित्र है कि किसी एक पार्टी को बहुत ज्यादा चंदा मिले और दूसरी रह जाय नहीं। प्रशासनिक प्रक्रिया में अदालत के हस्तक्षेप जैसा दूसरा उदाहरण नहीं हो सकता। वह किसी पार्टी को मिलने वाले कम या ज्यादा चंदे की चिंता करें। इतना ही नहीं अप्रैल और मई महीने के दौरान यह बांड खरीदने के दिन भी 10 से घटाकर 5 कर दे। इस अदालत ने इस सप्ताह ही राफेल विमानों के मामले में चोरी किए गए दस्तावेजों को प्रमाण के रूप में स्वीकार्य मानने का विवादास्पद निर्णय लिया था। जिसके कारण कांग्रेस को चुनाव के समय प्रधानमंत्री के ऊपर किचड़ उछालने का एक और अवसर मिल गया। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के ऐसे रुख से उनकी प्रजा में छाप मोदी विरोधी होने की मजबूत बने तो उसमें किसी को दोष नहीं दिया जा सकता। गोगोई को राममंदिर मामले की सुनवायी करने की जरा भी जल्दी नहीं लगती और कांग्रेस की इच्छानुसार उसका निर्णय संभव था तो भी उसे लिया नहीं गया। इलेक्ट्रॉल बांड के मामले में इस न्यायमूर्ति और उसकी खंडपीठ को इस मामले में फैसला देने की इतनी जल्दबाजी हो गयी कि चुनाव पूरा होने तक इस बारे में कोई निर्णय न लेने का सरकार का अनुरोध सुना नहीं। अदालत का यह आदेश ऐसे समय आया है जब चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गयी है और वर्तमान सरकार बिदा हो रही है। स्वाभाविक है कि चुनाव फंड में धन देने वालों विशेष रूप से मध्यम व्यापारियों और उद्योगपतियों में इस आदेश से घबराहट फैलेगी। बड़ी कंपनियों और उद्योगपतियों को यह चिंता नहीं होती क्योंकि वे सभी पार्टियों के साथ संबंध बनाकर रखते है तो भी अदालत के इस फैसले के बाद सभी दाताओं की पहली चिंता यह होगी कि मई अंत से सत्तारुढ़ होने वाली नई सरकार उनके खिलाफ किस कानून के तहत कैसे कदम उठाएगी।
मोदी सरकार की यह योजना एक महत्वपूर्ण चुनावी सुधार है उसने उसका भावनात्मक अमल भी किया है। चुनाव आयोग द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार 2017-18 में भाजपा को जो 990 करोड़ रु. का चुनावी चंदा इस बांड के मार्फत मिला उसमें से मात्र 342 करोड़ रु. 20,000 तक के छोटी नगदी रकम के रूप में था और बाकी का चेक में था। इसके विपरीत कांग्रेस को इस वर्ष में 161 करोड़ रु. का जो योगदान मिला उसमें से अधिकांश 141.50 करोड़ रु. नगदी में था। इसके बावजूद यह यथार्थ है कि इस बांड योजना के तहत काफी बड़ी खामी रह गयी थी जिससे उसके माध्यम से बड़े कालेधन को वैध करना सरल था। कोई भी व्यक्ति अनामी रहकर 20,000 रु. तक का चंदा नगद में दे सकता है।
अब यह नाम घोषित होगा। आरटीआई कानून का भरपूर उपयोग होगा और उसकी सूचना से परस्पर की दुश्मनी निकाली जाएगी यह सब चुनाव में पारदर्शिता लाने के नाम पर होगा।
इस कवायद में फायदा - चुनावी चंदा देने या लेने वाले - किसी को नहीं है सिवाय की प्रशांत भूषण जैसे लोगों को। 

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