गंभीर सूखे, खाद्य संकट एवं पेजयल की कमी का मंडराया खतरा

गंभीर सूखे, खाद्य संकट एवं पेजयल की कमी का मंडराया खतरा
उत्तर व पूर्वी भारत में तेजी से घट रहा भू-जल स्तर
हमारे संवाददाता  
नई दिल्ली । भारत के उत्तरी पूर्वी राज्यों में 2005 से लेकर 2013 के बीच इस्तेमाल योग्य भू-जल भंडार (यूजीडब्ल्यूएस) में तेजी से गिरावट आई है।जिससे गंभीर सूखे,खाद्य संकट और लाखों लोगों को लेकर पेयजल की कमी का खतरा बढ गया है।
दरअसल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) खड़गपुर,पश्चिम बंगाल और अथाबास्का विश्वविद्यारलय, कनाडा की एक टीम की तरफ से यह खुलासा पूरे देश में सीटू और उपग्रह आधारित मापन के आधार पर किया गया है।जिसके तहत इस शोधकर्ताओं ने इस नतीजे पर पहुंचने को लेकर देश भर में सीटू निगरानी आधारित 3,907 कुओं से भूजल स्तर के डाटा का भी उपयोग किया गया।जिसके तहत कुल इस्तेमाल किए जाने वाले भूजल का अनुमान 2005 से लेकर 2013 तक के आंकड़ों के आधार पर लगाया गया है।जिसको लेकर आईआईटी खड़गपुर में प्रोफेसर और प्रमुख शोधकर्ता अभिजीत मुखर्जी ने कहा कि भारत में प्रतिवर्ष 250 घन किलोमीटर भू जल का इस्तेमाल होता है।यह वैश्विक भू-जल इस्तेमाल का एक चौथाई है।उन्होंने कहा कि उत्तर भारत में प्रति वर्ष 8.5 घन किलोमीटर और पूर्वी भारत में पांच घन किलोमीटर की दर से भू-जल में गिरावट आ रही है।जिसको लेकर शोधकर्ताओं की तरफ से कहा गया है कि पहली बार इस्तेमाल करने योग्य भू-जल का अनुमान लगाया गया है।इससे पहले सरकारी एजेंसियां कुल उपलब्ध भू-जल का अनुमान लगाती थी जिसका एक छोटा हिस्सा ही इंसान अपनी जरुरतों को लेकर इस्तेमाल कर सकता है।ऐसे में शोधकर्ताओं के अध्ययन में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश,बिहार, असम,पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में इस्तेमाल होने योग्य भूजल के स्तर में तेजी से गिरावट देखी गई।वहीं असम के भू-जल में दो प्रतिशत की गिरावट आई है।उल्लेखनीय है कि देश में भू-जल से 85 प्रतिशत ग्रामीण आबादी की पेयजल जरुरतें पूरी होती है। इसके साथ ही देश में 65 प्रतिशत कृषि सिंचाई भू-जल पर निर्भर है।वहीं दे में 50 प्रतिशत शहरी आबादी की प्यास भू-जल से बुझती है।

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