कामकाज में कमी से धागे का भाव स्थिर

कामकाज में कमी से धागे का भाव स्थिर
हमारे संवाददाता
। आलोच्य सप्ताह में धागे के कारोबार में कोई सुधार नहीं है। बाजारों में कामकाज कम होने से धागे व तैयार कपड़ों का उठाव कम ही हो रहा है। मंडी में इन दिनों आगामी दीपावली के सीजन को ध्यान में रखते हुए ही कारोबारी चादरों के सेट व रजाई की तैयारी में लगे है। मंडी में बनने वाली रजाई की क्वालिटी के चलते ही कारोबारी प्योर काटन की न बनाकर के नान डाइंग के धागों में बना रहे है। पिछले कुछ वर्ष़ों से बढ़िया रजाइयों का उत्पादन कम हो रहा है। सप्लायरों का ज्यादा ध्यान नान डाइंग के धागों से बनने वाले कपड़ों पर है। इन कपड़ों के उत्पादन में कारोबारियों को ज्यादा मुनाफा होता है। बाजारों में कामकाजों की चाल मौसम साफ होने के साथ ही बनने लगी है।  
व्यपारिक सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार बाजारों में दिसावर की मंडियों से कामकाज कम ही हो रहे है। देशभर के कपड़ा उत्पादन केद्रों पर धागे का उठाव कम होने से मिलों का धागा कम ही उठ रहा है। मिलों की सेहत ठीक नहीं है। मंदी के चलते मिलों को भी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है। दिल्ली, पानीपत, मेरठ, मुरादनगर, पिलखुवा, सरधना आदि मंडियों में धागे की खपत लगातार ही घट रही है। इन कपड़ा मंडियों में धागे की खपत कम होने को लेकर के सूत का कारोबार करने वाले तो परेशान है ही साथ ही मिल वाले भी परेशान है।   
कारखानों में बनने वाले ज्यादातर कपड़े नान डाइंग के धागो से बन रहे है। नान डाइंग के धागों से बनने वाले कपड़ा की मांग भी लगातर ही घट रही है। मांग घटने के साथ ही कामकाजों पर भी अब इसका असर दिखायी पड़ने लगा है लेकिन ज्यादा लाभ के कारण ही सप्लायर व इसको बेचने वाले इसका मोह नहीं छोड़ रहे है। आगामी दीपावली के सीजन को ध्यान में रखते हुए ही कारोबारी चादरों को विभिन्न प्रकार की क्वालिटी का माल तैयार करा रहे है। चादरों को दीपावली पर पैकिंग में गिफ्ट के रूप में काफी प्रचलन है। कारोबारी बताते है कि एक-एक चादर की पैंकिग पचास से लेकर के सौ रुपये तक की पैकिंग में है।  
कारोबारी आगामी सर्दी के सीजन को ध्यान में रखते हुए पिछले कुछ वर्ष़ों से प्योर काटन की बनने वाली रजाई को अब ज्यादा मुनाफे के चक्कर में नान डाइंग के धागे से बनने वाले कपड़े को बना रहे है। कपड़े की रंगाई व छपाई होने के बाद आसानी से यह नहीं पता चलता कि यह नान डाइंग की है। ग्राहकों के हित को यहां पर पूरी तरह से छोड़ दिया गया है। व्यापारी केवल अपने हित के लिये ही काम कर रहा है। बढ़िया रजाई कम ही बन रही है। बढ़िया का माल जितना बन रहा है उन कारोबारियों को कहना है कि हमें अपना माल लागत महंगी होने के बाद भी बेचने में परेशानी नहीं हो रही है।  
बाजारों में आगामी त्योहारों को देखते हुए ही दिसावर की मंडियों से अब आर्डर आने आरंभ हो गये है।

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