आसियान देशों के बीच आरसेप करार से कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान होने की संभावना

आसियान देशों के बीच आरसेप करार से कपड़ा उद्योग को भारी नुकसान होने की संभावना
सूरत, भिवंडी, मालेगांव सहित देशभर के वीवर्स चिंता में
ख्याति जोशी
सूरत। आगामी नवंबर महीने में केद्र सरकार आसियान देशों के साथ रिजनल काम्प्रिहेन्सिव इकोनामिक पार्टनरशिप (आरसेप) करार करने जा रही है। सूत्रों के अनुसार आरसेप करार को लेकर केद्र सरकार अंतिम मुंहर लगाने के मूड में है, लेकिन अभी तक आरसेप करार को लेकर स्थानीय उद्योगों को विश्वास में नहीं लिया गया। खेती के बाद सबसे बड़ा रोजगार देने वाले देश के कपड़ा उद्योग को आरसेप करार से भारी नुकसान होने का भय सता रहा है।
इस मामले में ही सूरत, भिवंडी, मालेगांव के वीवर्स अग्रणियों और संगठनों की आयोजित बैठक में आरसेप करार को लेकर चिंता व्यक्त की गयी। इसके साथ केद्र सरकार के समक्ष करार से भविष्य में स्थापित होने वाली कठिनाइयों को पेश किया जाएगा, ऐसा निर्णय लिया गया। एकत्र हुए वीवर्स अग्रणी और संगठनों ने कहा कि आरसेप करार भारत के हित में नहीं है। आसियान देशों के बीच प्रादेशिक व्यापारी आर्थिक भागीदारी में ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपिंस सिंगापुर, विएतनाम, थाइलøड सहित आस्ट्रेलिया, चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया, न्यूजीलøड का समावेश होता है।
आरसेप करार के अनुसार उपयुक्त देशों के साथ शून्य डय़ूटी से मुक्त व्यापार किया जाएगा। करार में अधिकांश उद्योगों का समावेश किया गया है। भारत का कपड़ा उद्योग भी आरसेप करार का मुख्य हिस्सा है। आरसेप करार में शून्य डय़ूटी व्यापार का लाइसेंस आसियान देशों को दिया जाएगा। पहले से ही चीन वाया बांग्लादेश, विएतनाम होकर भारत में कपड़े का निर्यात करता है। यदि आरसेप करार हुआ तो चीन भारत में अपना बड़ा मार्केट बना सकता है।
फीआस्वी के चेयरमैन भरतभाई गांधी का कहना हैकि आरसेप मामले में अभी तक कपड़ा उद्योग को विश्वास में नहीं लिया गया है। यदि शून्य डय़ूटी से बाहर के देशों का कपड़ा भारत में डम्प होता हैतो स्थानीय वीविंग उद्योग को भारी झटका लग सकता है। आरसेप करार में शुरुआत के वर्ष़ों में ही शून्य डय़ूटी से बाहर के देशों का कपड़ा भारत में आ जाए ऐसा नहीं है। लेकिन चरणवार डय़ूटी में कमी करके 20 वर्ष की समयावधि में उसे शून्य तक पहुंचाने का सुझाव आरसेप करार में शामिल है। उन्होंने कहा कि केद्र सरकार चाहती हैकि भारत को भी आरसेप में जुड़ना चाहिए तो भी सरकार को पहले कपड़ा उद्योग को विश्वास में लेना चाहिए। इस मामले में आगामी दिनों में सूरत-नवसारी के सांसदों, मुख्यमंत्री विजय रूपाणी, वस्त्र मंत्रालय और पीएमओ को जानकारी दी जाएगी।
अग्रणी वीवर्स मयूर गोलवाला का कहना हैकि देशभर के वीवर्स संगठनों को आरसेप को लेकर चिंता है। दक्षिण गुजरात चेम्बर में आयोजित बैठक में भिवंडी, मालेगांव के वीवर्स अग्रणी उपस्थित रहे। उन्होंने आरसेप से कपड़ा उद्योग को होने वाले नुकसान के बारे में विगतवार प्रजेंटेशन दिया। उनकी मांग के बाद देशभर के वीवर्स संगठनों तक आरसेप करार से होने वाले नुकसान के बारे में जागृति अभियान चलाने की जरूरत है। सरकार के समक्ष शीघ्र ही मांग की जाएगी।
उल्लेखनीय हैकि आरसेप कल्पना को आसियान देशों द्वारा वर्ष 2011 में प्रोत्साहन दिया गया, लेकिन इसकी विगतवार घोषणा वर्ष 2012 में आसियान शिखर सम्मेलन में की गयी थी। इसके लिए बातचीत करने वाले वर्ष 2013 में पहली बार मिले थे। 6 वर्ष बाद आयोजित बैठक में भारत-चीन के बीच व्यापारी संबंध मजदूर वर्ग, पर्यावरणीय संरक्षण तथा आस्ट्रेलिया और न्यूजीलøड के व्यापारी परिस्थिति के बारे में चर्चा और कठिनाइयों का परिदृश्य पेश किया गया।
अधिकांश मामलों पर सहमति आसियान देशों के बीच होने की बात बाहर आयी। गत मई महीने में चीन ने आपत्ति कर देशों के बगैर बातचीत समाप्त करने की योजना का प्रस्ताव रखा।
चीन, जापान और दक्षिण कोरिया करार में जुड़ने के बाद पीछे से जुड़ने की इच्छा रखने वाले भारत, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलøड के लिए जगह छोड़ने का निर्णय किया गया। हाल ही में आसियान राजद्वारी ने एक वक्तव्य में कहा कि भारतीय बाजार के कद को देखते हुए आरसेप में भारत के जुड़े बिना कोई अर्थ नहीं है।
भारत को आरसेप सौदे में कितना नुकसान?
आरसेप के सौदे में कपड़ा उद्योग, हैवी इंडस्ट्रीज, डेरी उद्योग सहित उद्योगों का समावेश किया गया है। कपड़ा उद्योग की बात करें तो भारत अपनी उत्पादन क्षमता बांग्लादेश और विएतनाम के समक्ष खो रहा है। यह बात जगजाहिर हैकि चीन के साथ अभी भी स्पर्धा में हम काफी पीछे है। चीन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से भारतीय बाजार में अपना उत्पादन ठेल रहा है। आरसेप सौदा 16 से अधिक देशों के 3.4 बिलियन लोगों को प्रभावित करेगा, ऐसा है। करार से चीनी आयात के बाढ़ का दरवाजा भारत में खुलेगा जो घरेलू उद्योगों और उत्पादकों को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।

© 2019 Saurashtra Trust

Developed & Maintain by Webpioneer