तिल की फसल को खासा नुकसान, एडवांस सौदे करने वाले निर्यातक चिंतित

तिल की फसल को खासा नुकसान, एडवांस सौदे करने वाले निर्यातक चिंतित
हमारे संवाददाता
राजकोट। गुजरात के सौराष्ट्र एवं कच्छ इलाके में हाल में हुई बारिश से तिल की फसल को काफी नुकसान हुआ हैजबकि, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में यह नुकसान ज्यादा नहीं है। लेकिन इस साल हुई बेहतर बोआई के बाद शुरुआती आंकलन 3.50-4 लाख टन तिल की पैदावार होने का कारोबारी अनुमान था, वह अब 2.50 लाख टन पर आ गया है। केंद्र सरकार के खरीफ फसल वर्ष 2019-20 के पहले अग्रिम उत्पादन अनुमान के मुताबिक देश में 6.86 लाख टन तिल की उपज होने का अनुमान हैजबकि लक्ष्य 10.17 लाख टन का रखा गया था। वर्ष 2018-19 में इसकी पैदावार 7.55 लाख टन, वर्ष 2017-18 में भी 7.55 लाख टन आंकी गई। 
गुजरात में हाल की जोरदार बारिश से सौराष्ट्र में तिल की फसल को 40-50% नुकसान हुआ हैजबकि समूचे गुजरात में यह नुकसान 60-70% तक आंका जा रहा है। मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में हाल की मूसलाधार बारिश से खेतों में पानी का जमाव हुआ एवं तिल की फसल को नुकसान हुआ हैलेकिन यह नुकसान 10-20% आंका जा रहा है। कारोबारियों एवं किसानों का मानना हैइस साल अब जो तिल की आवक होगी उसमें क्वालिटी खराब होगी एवं सबसे ज्यादा नुकसान उन खेतों में हुआ हैजहां तिल की कटाई हो चुकी थी एवं खेतों में रखा हुआ था। इस तिल की क्वालिटी सबसे ज्यादा खराब होगी। 
हालांकि, इस साल शुरुआती मानसून एवं अनुकूल मौसम की वजह से तिल की फसल काफी अच्छी थी एवं अधिक उत्पादन के अनुमान को देखते हुए इसके एडवांस निर्यात सौदे भी हुए थे लेकिन अब ये सौदे करने वालों के सामने उस क्वालिटी का तिल बाजार में मिलने का सवाल खड़ा हो गया है। निर्यातकों ने काफी निचले भावों पर नेचुरल और सार्टेक्स तिल के निर्यात सौदे किए थे लेकिन अब नेचुरल तिल 115 रुपए प्रति किलोग्राम एवं सार्टेक्स के सौदे 123 रुपए प्रति किलोग्राम बोला जा रहा है। नेचुरल तिल के कुछ सौदे खास डिस्काउंट के साथ 101 रुपए प्रति किलोग्राम पर भी हुए थे। ऐसे में अब घरेलू निर्यातक क्वालिटी तिल की खरीद एवं बढ़े भाव को लेकर चिंतित है। 
भारत में तिल की फसल खराब होने के समाचार के बाद अफ्रीकन देशों ने अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपने तिल के दाम ऊंचे बोलने शुरू कर दिए है। अफ्रीकन तिल का भाव कुछ दिनों पहले दिसंबर डिलीवरी 1200-1300 डॉलर प्रति टन बोला जा रहा था जो अब 1500 डॉलर प्रति टन बोला जा रहा है। इस खासी भाव बढ़ोतरी से अंतरराष्ट्रीय बाजार में यह आशंका बढ़ गई हैकि अफ्रीकन निर्यातक डिलीवरी देने में डिफाल्ट न कर जाएं। बता दें कि पहले ऐसी कई घटनाएं इन देशों के निर्यातक कर चुके है। 
भारतीय कारोबारियों का कहना हैकि मौसम विभाग अभी भी तिल उत्पादक इलाकों में बारिश दिखा रहा है। यदि यह बारिश अब होती हैतो तिल के दाम 10-15 रुपए प्रति किलोग्राम और बढ़ सकते है। बीते तीन-चार दिन से मौसम साफ होने की वजह से तिल के दाम नीचे उतरे है, लेकिन उत्पादन को वाकई कितना नुकसान होता हैयह पूरा आंकलन एक सप्ताह बाद होने पर भावों की दिशा तय होगी। फिलहाल, ऊंचे भावों पर खरीददारों के पीछे हटने से इनमें सुस्ती आई है। अपने देश से हर साल नेचुरल तिल का निर्यात तकरीबन डेढ़ लाख टन एवं हल्द तिल का निर्यात दो लाख टन होता है। हल्द तिल तैयार करने के लिए भारत हर साल अफ्रीकन देशों से डेढ़ लाख टन तिल का आयात करता है। यह आयात पिछले कई सालों में बढ़ता रहा हैएवं अफ्रीकन देशों में हल्द तिल की प्रोसेसिंग इकाइयां न होने से भारत ही इसका निर्यात करता है, जबकि नेचुरल तिल के निर्यात में अफ्रीकन देशों की हिस्सेदारी हर साल बढ़ती जा रही है। अफ्रीकन देश जो कुछ साल पहले 60-70 हजार टन  तिल का उत्पादन करते थे अब दस लाख टन तिल का सालाना पैदा कर रहे है।

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