सुप्रीम कोर्ट ने दी बारह दिन की मोहलत

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बोबड़े ने देश की मौजूदा स्थिति के बारे में चिंता व्यक्त की है और स्पष्टरूप से कहा कि शांति स्थापित होने तक नागरिकता कानून की संवैधानिकता की समीक्षा के मामले की सुनवायी नहीं होगी। यह सुनवायी 22 जनवरी से शुरू होने की घोषणा पहले हुई है, जिससे अब सरकार और आंदोलनकारियों को 12 दिन की मोहलत मिली है, ऐसा जानना चाहिए और इसमें मुख्य जवाबदारी सरकार की नहीं- आंदोलन के पीछे जिसका दिमाक और हाथ है उनकी है। 12 दिन में यदि आंदोलन शांत नहीं होगा तो सुप्रीम कोर्ट को सख्त फटकार लगानी पड़ेगी। सुनवायी में विलंब भी हो सकता है। सरकार का संबंध है वहां तक- संसद में पारित किए गए विधेयक- कानून की संवैधानिकता को जिन्होंने चुनौती दी है उनकी जवाबदारी शांति के लिए है। सरकार का काम कानून-व्यवस्था बनाए रखना है और कानून आने के बाद भी जवाबदारी है।
आंदोलन शांत किस तरह होगा? विपक्षी संयुक्त बैठक में एकता की चर्चा करने से पहले कांग्रेस कारोबारी की बैठक बुलायी गयी है। जेएनयू में वाइस चांसलर को हटाने की मांग है। फीस घटाने की मांग है। कोई भी सरकार इस तरीके से वाइस चांसलर को नहीं हटाएगी- शांतिमय आंदोलन हो तो अलग बात है। भाजपा के वरिष्ठ लेकिन दुखी निराश नेता डा. मुरली मनोहर जोशी भी यशवंत सिन्हा की तरह सार्वजनिक में आए हø 
और वाइस चांसलर को हटाने की मांग की है। इस बीच अब कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी विधिवत मैदान में आयी है। सोमवार को उन्होंने मित्र-विपक्ष की बैठक बुलायी है। जिसमें मुख्य विपक्ष की जवाबदारी उठाकर सरकार के खिलाफ कैसी लड़ाई लड़नी है उसका निर्णय लिया जाएगा। महाराष्ट्र में `छोटा भाई' बनने के बाद अब दिल्ली में हब जमाना जरूरी है, लेकिन इस बैठक में ममता दीदी शामिल नहीं होंगी- क्योंकि कांग्रेस ने बंगाल में वामपंथियों का हाथ पकड़कर ममता को चुनौती दी है! इससे पहले मायावती ने भी आरोप लगाया था कि नागरिकता के नाम पर कांग्रेस अपनी राजनीति खेल रही है।
कांग्रेस को लगता है कि इस समय अवसर मिला है। कश्मीर में 16 देशों के राजदूतों-एम्बेसेडरों को स्थिति प्रत्यक्ष बताने के लिए ले जाया गया, उसका भी विरोध हुआ है कि प्रायोजित टूर है। हकीकत में विपक्ष के नेता भी विदेशी प्रतिनिधियों से मिले हø। इंटरनेट में छूट दी जा रही है- तब सुप्रीम कोर्ट ने भी राज्यभर में इंटरनेट की छूट देने के लिए समय दिया है और सरकार उसे स्वीकार कर अमल करेगी। जिससे विपक्षी प्रचार को जवाब मिलेगा।
राजधानी में विधानसभा के चुनाव में `आप' के केजरीवाल को फिर से सत्ता मिलेगी। वह लगभग निश्चित माना जाता है। उन्होंने गरीब-मध्यम वर्ग का बिजली का बिल माफ करने जैसा जनकल्याण का काम किया है। इसके अलावा राजधानी में मुस्लिम मत भी कांग्रेस को नहीं- `आप' को मिलेगा जिससे केजरीवाल जोश में है।

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