संविधान को खतरा किससे?

पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने- नागरिकता कानून के विरोध में देशभर में पिछले 40 दिन से चल रहे आंदोलन से हृदय पुलकित होता है- ऐसा वक्तव्य दिया है। उन्होंने ``शांतिपूर्ण आंदोलन और विरोध प्रदर्शनों'' की प्रशंसा की है, क्योंकि युवा वर्ग ने भारत के संविधान में विश्वास, श्रद्धा व्यक्त की है। इससे हमारे लोकतंत्र की जड़ गहरी हो रही है, मजबूत बन रही है, ऐसा प्रणवदा का कहना है।
आज के भारत में वरिष्ठ नेता माना जा सके, ऐसे एकमात्र पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी हैं। उन्होंने संविधान में श्रद्धा और लोकतंत्र में श्रद्धा और लोकतंत्र की शक्ति की बात की है, वह स्वीकार्य है, लेकिन उन्होंने यदि राजनीतिक नेताओं को कुप्रचार, उत्तेजक भाषण और हिंसा को बढ़ावा देना, बंद करने की सलाह दी होती, राजनीति के बदले राष्ट्रभावना का अनुरोध किया होता तो उनके स्थान और मान में जरूर वृद्धि हुई होती, ऐसा कहना चाहिए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समय कानून का विरोध संविधान के नाम पर- मुसलमानों के प्रति भेदभाव रखने के आरोप के आधार पर होता है। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले की प्रतिक्षा करने की जरूरत है। कानून में भारत के नागरिक हों, उनके साथ अन्याय करने की संभावना नहीं है- ऐसा भरोसा गा-बजाकर दिया गया है- लेकिन कानून में धर्म का उल्लेख किए बगैर प्रतिबंधित देशों के नाम दिए गए होते तो इतना ऊहापोह नहीं होता। अब धर्म के नाम पर आंदोलन के कारण उसकी विपरीत प्रतिक्रिया होने की संभावना, आशंका रहती है।
भारत में मुसलमानों पर इस कानून का विपरीत असर नहीं है, लेकिन जनगणना फार्म और नागरिकों की जनगणना में जो सूचना मांगी गयी है उसका विरोध है कि धर्म की जानकारी मिलने के बाद भेदभाव होगा... वास्तव में ``वोट बक'' का लाभ लेने के लिए राजनीतिक नेताओं ने भेदभाव खड़ा किया है। अब विपक्ष के नेता भारत में फिर से विभाजन करने का आरोप लगा रहे हैं- लेकिन ऐसी हवा खड़ी करने वाले नेता ही हैं।
नई दिल्ली में और अन्यत्र आंदोलन-धरना होता है, उसके मूलकारण में कानून नहीं- `गणना' है, और उसके प्रावधानों का भय है। युवा वर्ग-विद्यार्थियों का आंदोलन अब `शांतिपूर्ण' है- इसके बावजूद उसके पीछे `पूर्ण राजनीति' है। उससे इन्कार नहीं किया जा सकता।
मौजूदा वातावरण में सभी पार्टियों के नेताओं को सत्ता की `गंध' आती है! शरद पवार जैसे वरिष्ठ-वयोवृद्ध नेता को ऐसा कहने की जरूरत थी कि महाराष्ट्र में मुसलमानों के कहने से, भाजपा को दूर रखने के लिए हमने शिवसेना के साथ सरकार बनाई है?!
इस वक्तव्य का ``संदर्भयुक्त संबंध'' पूर्व राष्ट्रपति-प्रखर राजनीतिज्ञ प्रणव मुखर्जी क्या नहीं जानते होंगे?

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