भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का भविष्य उज्ज्वल

भारतीय टेक्सटाइल उद्योग का भविष्य उज्ज्वल
अब नया दौर शुरू
विशेष संवाददाता
मुंबई। कपास और पीटीए तथा यार्न से तैयार वस्त्रों तक के उत्पादों की संपूर्ण मूल्यवर्धित बड़ी श्रृंखला (वैल्यू चेन) चीन के बाद मात्र भारत के पास होने से पूर्व चीन में फैले कोरोना वायरस के जान लेवा आपदा का अल्प से दीर्घकालीन अधिकतम लाभ उठा सकने की स्थिति में हैं, ऐसा टेक्सप्रोसिल के वाइस चेयरमैन मनोजकुमार पाटोडिया और एक्जिक्युटिव डायरेक्टर डॉ. सिद्धार्थ राजगोपाल ने व्यापार को बताया।
जो अंतरराष्ट्रीय ग्राहक अपने टेक्सटाइल संबंधी संपूर्ण जरूरतों के लिए चीन पर निर्भर हैं, उनको एकाएक यह भूल समझ में आने से वे खरीदी के और स्रोत विकसित करेंगे। तब उनकी पहली पसंद भारत होगा, उन्होंने एक साक्षात्कार में उक्त बात कही।
 प्रस्तुत है साक्षात्कार
चीन में चल रहे कोरोना वायरस के कहर के कारण वहां के टेक्सटाइल उद्योग की स्थिति कैसी है?
पाटोडिया : चीनी नव वर्ष की छुट्टियां वहां बढ़ायी गई है। एकाध सप्ताह बाद पता चलेगा कि वहां कितने कारखाने चालू होने की स्थिति में हैं। हमें ऐसी जानकारी मिली है कि चीन के टेक्सटाइल उद्योग के नियमित ग्राहक भी आपूर्ति प्राप्त करने की चिंता में हैं। यूरोप, अमेरिका में रिटेल तथा फैशन उद्योग का नया सीजन शुरू हो रहा है जिससे वे माल प्राप्त करने के स्रोत पर निर्भरता घटाने की दीर्घकालीन विचार कर रहे हैं। उनके लिए आपूर्ति प्राप्त करने के अन्य स्रोत हैं- भारत, बांग्लादेश, विएतनाम जैसे देश। इसमें भारत एकमात्र ऐसा देश है, जो फाइबर से कपड़ा और वस्त्र तक का माल प्रदान करने की स्थिति में है। ऐसी स्थिति का लाभ भारत को मिलेगा। आगामी समय में चीन के नियमित ग्राहक जब भी नए देश से माल खरीदने का आयोजन करेंगे तब वे भारत के बारे में अवश्य विचार करेंगे।
मात्र भारत को ही क्यों लाभ मिलेगा? भारत के छोटे प्रतिस्पर्धी देश भी इस अवसर का लाभ लेने के लिए आगे नहीं आएंगे?
पाटोडिया : इन छोटे देशों के पास उत्पादन क्षमता है, लेकिन उनके पास पूरा वैल्यूचेन नहीं है। उनके पास वस्त्र बनाने की क्षमता है, लेकिन रुई, पोलिएस्टर फाइबर जैसे कच्चे माल के उत्पादन की पर्याप्त क्षमता नहीं है। वेअ न्य देशों के पास से कच्चा माल प्राप्त करते हैं जबकि भारत एकमात्र देश है जिसके पास वह संपूर्ण वैल्यूचेन है।
राजगोपाल : भारत के पास फाइबर से फैशन तक का संपूर्ण वैल्यू चेन होने से वह लाभ लेने की अच्छी स्थिति में है।
एक विचार ऐसा है कि भारतीय टेक्सटाइल प्रोडक्ट्स का भाव ऊंचा होने से वे छोटे देशों की स्पर्धा में पीछे रह जाते हैं।
पाटोडिया : निर्यातक भाव माल की मांग और आपूर्ति के आधार पर निश्चित करेंगे। भारत को यदि अधिक निर्यात आधार मिले तो उसके लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाना मुश्किल नहीं होगा और प्रोडक्ट डेवलप करना भी संभव है। भारत के पास यदि तत्काल अधिक आर्डर आए तो 6 महीने तक की जरूरत पूरी करने की क्षमता तो हैं।
चीन की वर्तमान मुश्किल अस्थाथी प्रकार की है। यह मुश्किल समय बीत जाने के बाद क्या उसके ग्राहक फिर से चीन की ओर मुड़ेंगे?
पाटोडिया : चीन के ग्राहकों ने अनुभव से सीखा है कि आपूर्ति स्रोत के लिए एक ही देश पर निर्भरता न रखें। जिससे वे दीर्घकालीन आयोजन करेंगे।
वर्तमान स्थिति में भारतीय टेक्सटाइल के किस क्षेत्र को कैसा लाभ मिल सकेगा?
पाटोडिया : कपास की फसल अच्छी है, इससे काटन टेक्सटाइल उद्योग अच्छा लाभ लेने की स्थिति में है। स्पिनिंग उद्योग के पास पर्याप्त क्षमता है। पीटीए पर एंटि-डम्पिंग डय़ूटी हटाने के बाद पोलिएस्टर यार्न का भाव घटा है जिससे उसकी फाइबर सहित मूल्यवर्धित आइटम बनाने की स्पर्धात्मकता 30% सुधरी है। पावरलूम और मिलों के पास फैब्रिक बनाने की अच्छी उत्पादन क्षमता है। गार्म़ेंट उद्योग स्वयं एक बड़ा उद्योग है। टेक्सटाइल उद्योग की उत्पादन और मुनाफा शक्ति सुधरेगी तो वे नए प्रोडक्ट्स बनाने का भी आयोजन शुरू करेंगे।
भारतीय टेक्सटाइल उत्पादों का भाव अन्य देशों के सामने अस्पर्धात्मक होने के बारे में आपका क्या कहना है?
राजगोपाल : समग्र रूप से देखें तो यह बड़ा प्रश्न नहीं है। हम कपास, यार्न, फाइबर आदि का निर्यात करते ही हैं जिनके पास वैल्यू चेन है, उनको अधिक फायदा है। मैन मेड फाइबर की मध्यम और छोटी इकाइयों को भी फायदा होगा और सरकार के विभिन्न कदमों से कपड़ा तक के कच्चे माल के भाव में 30% की कमी हो सकेगी जिससे भारत कीमत की दृष्टि से अब अन्य देशों के साथ स्पर्धा करने की स्थिति में है।
पाटोडिया : सरकार द्वारा नई उत्पादक इकाइयों के लिए कार्पोरेट टैक्स घटाकर 15% करने से भारत अधिक स्पर्धात्मक स्थिति में आ गया है। इस बजट में एंटि-डम्पिंग डय़ूटी हटा दी गई है।
राजगोपाल : सरकार ने एसएमई क्षेत्र के लिए कई कदम उठाए हैं। रिजर्व बक ने छोटे उद्योगों के लिए Iण सुविधा प्राप्त करना सरल और सस्ता बनाया है।
भारतीय टेक्सटाइल्स का निर्यात अल्प से मध्यम अवधि में कितना बढ़ सकता है?
पाटोडिया : कहना मुश्किल और शीघ्रता है, लेकिन 10 से 20% निरंतर विकास का लाभ निश्चित मिलेगा। निर्यात यदि 10% बढ़े तो रोजगार निर्माण की संभावना भी उतनी बढ़ सकेगी। सिलाई, डाइंग, वीविंग क्षेत्र में रोजगार निर्माण की संभावना बढ़ेगी।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीन के टेक्सटाइल उद्योग की समस्याओं का लाभ लेने के लिए सरकार और उद्योग को संयुक्त व्यूह बनाना चाहिए, ऐसा क्या आपको लगता है?
पाटोडिया : निर्यातकों को टैक्स रिफंड समय से मिले, उसका सरकार को विशेष ध्यान रखना चाहिए। दक्षिण-पूर्व देशों के साथ मुक्त व्यापार करना चाहिए। सरकार की नीतियां दीर्घकालीन होनी चाहिए। उद्योग के विकास के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है। निवेशक भी अल्पकाल की बारंबार नीति विषयक बदलाव होता हो, ऐसे देशों को पसंद नहीं करते। टेक्सटाइल उद्योग के कामगारलक्षी होने, उसमें किए गए निवेश को वापस मिलने की अवधि 8 से 10 वर्ष की है।    
गुजरात सरकार गार्म़ेंट पालिसी में होम टेक्सटाइल्स का भी समावेश करें
गुजरात सरकार द्वारा हाल में घोषित की गई गार्म़ेंट पालिसी में टॉवेल, मेट्रेस कवर, बेडशीट्स, बेट कवर जैसे होम टेक्सटाइल के आइटमों का समावेश करना चाहिए था, ऐसी मांग टेक्सप्रोसिल के वाइस चेयरमैन मनोजकुमार पाटोडिया ने की है।
मेड-अप्स में दैनिक उपयोग के कपड़े के कई आइटम आते हैं, जिसे बनाने में लघु और मध्यम उद्योग बड़े पैमाने पर व्यस्त हैं और वे बड़े पैमाने पर रोजगार प्रदान करते हैं।
पाटोडिया ने कहा कि सरकार ने अपनी गार्म़ेंट नीति में `गार्म़ेंट' शब्द डाला है। इसके साथ मेड-अप्स भी डाला होता तो उसमें भारी परिवर्तन लाने की क्षमता है। मेड-अप्स के उत्पादन के विभिन्न वैल्यू चेन में चीन से बड़े पैमाने पर निवेश आने की संभावना है। निवेश बढ़ने से रोजगार भी बढ़ेगा।

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