कर्नाटक में रेशम उत्पादन बढ़ेगा

कर्नाटक में रेशम उत्पादन बढ़ेगा
वातावरण बदलने तथा कीटनाशक के उपयोग से फसल की बीमारी नियंत्रण में
मैसूर । स्थानीय में उत्पपन्न किए गए रेशम की मांग बढ़ रही है, तो कर्नाटक भी रेशम कीड़ा के केशेटो को होने वाले मलवेरी के रोग को मात देकर अधिक उत्पादन के लिए समय पर सज्ज हुआ है। शेतुर के अंकुर और पत्ते पर रहते इस कीटाणु के कारण कर्नाटक में रेशम उत्पादन प्रभावित हुआ है। पिछले कुछ दिनों में वातावरण में परिवर्तन और जंतुनाशक के उपयोग के कारण बीमारी पर नियंत्रण पाया जा सका है और बाजार में केशेटो की आवक बढ़ी है। पिछले 3 महीने से केशेटो का भाव उच्च स्तर पर रहा, जो पिछले एक सप्ताह से कुछ घटने की जानकारी डिप्टी डायरेक्टर आफ सेरी कल्चर मुनिशी बसैयाह ने दी।
कर्नाटक में रमनगारम केशेटो की सबसे बड़ी बाजार है। जिसमें पिछले 3 से 4 महीने में उत्पादन कम हुआ, इस दौरान दैनिक 25-30 टन केशेटो का सौदा हुआ लेकिन विगत सप्ताह बाजार में दैनिक 50 टन से अधिक आवक के कारण भाव घटा है।
जनवरी - फरवरी में संकर केशेटो का अवसतन भाव 480 से 495 रु. है। जबकि उच्च किस्म के केशेटो का भाव 630 से 670 रु. है, जो घटकर संकर केशेटो के लिए 400 और उच्च किस्म के लिए 492 रु. है।
बसैयाह ने बताया कि केशेटो के ऊंचे भाव के कारण राज्य में कई सिलिंग यूनिट्स लगभग आधी क्षमता से कार्यरत रही। अब केशेटो का भाव घटने तथा कोरोना वायरस के कारण चीन से रेशम आयात अवरुद्ध होने और कच्चे माल की मांग बढ़ने की अपेक्षा से स्थानीय में कच्चे रेशम का उत्पादन बढ़ेगा। चीन के रेशम का जितना माल उपलब्ध है वह तेजी से पूरा हो रहा है। लगभग 2 महीने से चीन के रेशम का आयात अवरुद्ध है, ऐसे में स्थानीय रेशम की मांग और आपूर्ति के बीच भारी अंतर रहने का अनुमान है।
बंग्लुरु में रेशम के व्यापारी अशोक करबाला ने बताया कि आयातित चायनीज सिल्क नहीं मिलने से उन्हें अनेक आर्डर कसल करना पड़ा। कोरोना वायरस के कारण 10000 मीटर फैब्रिक लेकर निकलने वाला जहाज चीन के बंदरगाह से नहीं निकल सका। हालांकि सेंटर सिल्क बोर्ड (सीएसबी) के सूत्रों के अनुसार भारत में रेशम बुनाई उद्योग का अधिकांश जरूरत का हिस्सा स्थानीय बाजार से ही पूरा होता है और निर्यातकों की भूमिका सिमित है।
साड़ी बनाने वाले से लेकर स्थानीय बाजार को माल देने वाले रेशम उत्पादकों को विशेष असर नहीं हुआ है। कर्नाटक सिल्क इंडस्ट्रीज कार्पोरेशन के जनरल मैनेजर क्रिश्नप्पा का कहना है कि वे मैसूर सिल्क साड़ी बनाने के लिए देश में निर्मित रेशम का ही उपयोग करते हैं । कर्नाटक वीवर्स फेडरेशन के प्रमुख टीवीमारुथी ने कहा कि साड़ी के अधिकांश उत्पादक अब पहले की तरह अब चायनीज सिल्क पर निर्भर नहीं रहते।

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