श्रमिक कानून में सुधार : अध्यादेश को लगेगा ब्रेक ?

लाखों श्रमिकों की घर वापसी के लिए रेलवे - बस की व्यवस्था और किराये के भुगतान के बारे में राजनितिक विवाद विफल होने के बाद अब मुख्य विपक्ष कांग्रेस श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए भाजपा सरकार के खिलाफ लड़ने की तैयारी कर रहा है। उत्तर प्रदेश- गुजरात- भाजपा शासित राज्य उद्योगों को आकर्षित करने के लिए कामगार कानून में सुधार करना चाहते हैं- इसलिए देशव्यापी विरोध शुरू करने के लिए कांग्रेस प्रमुख सोनियाजी ने सभी विपक्षी नेताओं के साथ विचार-विमर्श किया है- अलबत्ता विरोध आंदोलन कितना सफल होता है, यह देखना है- क्योंकि राज्यों को ऐसे सुधार करने के लिए केंद्र की मंजूरी नहीं मिलेगी। राज्य सरकारों ने अध्यादेश को राष्ट्रपति जी की मंजूरी के लिए भेजा है- लेकिन कामगार- कानून- से सम्बंधित प्रस्ताव संसद के समक्ष होने - और विरोधी पक्ष 'राजनितिक अवसर' का लाभ न उठा लें, इसके लिए फ़िलहाल तुरंत केंद्र की मंजूरी मिलने की संभावना नहीं है। राष्ट्रपति अध्यादेश को तुरंत भेजते हैं या विचार करने के लिए रखते हैं, यह देखना है। फिलहाल उत्तर प्रदेश सरकार ने एक रास्ता और निकाला है कि आगामी 6 महीने के लिए किसी भी तरह के हड़ताल पर प्रतिबन्ध लगा दिया है, जिससे प्रदेश में हड़ताल जैसी कोई समस्या उत्पन्न न हो। 
पिछले 20-25 दिन में लाखों श्रमिक अधिकांशत: बिहार-उत्तरप्रदेश पहुंच गए हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने श्रमिकों को रोजी- रोटी का प्रबंध करने और राज्य में कायम रूप से रह सकें उसके लिए छोटे-मध्यम उद्योग शुरू करने की तैयारी की है। इसके साथ जूने-पुराने कामगार कानून को रद्द कर - अथवा इसमें सुधार कर उद्योगपतियों को पूँजी निवेश के लिए आकर्षित करने का कदम उठाया है- संकट के इस समय में विपक्ष- कांग्रेस को अवसर मिला है! श्रमिकों का पंजीयन- डेटाबेस तैयार करा रहे हैं और कामगार विरोधी कदम के सामने आंदोलन करना चाहते हैं।  
दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश और केरल में श्रमिकों की मांग बढ़ रही है।  
लाखों की संख्या में श्रमिक वापस आ रहे हैं तो इनके रोजी- रोटी की समस्या उत्पन्न होगी, लेकिन योगी सरकार ने पूर्व आयोजन किया है। राज्य के प्रत्येक जिले में छोटे-मध्यम उद्योग स्थापित करने के लिए विशेष समिति नियुक्त कर तात्कालिक मंजूरी दी जा रही है। खादी, फ़ूड प्रोसेसिंग जैसे छोटे उद्योगों के लिए मार्गदर्शन दिया जा रहा है। इस क्षेत्र में 20 लाख रोजगार सर्जन का लक्ष्य है, इसके अलावा महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार योजना के तहत 25 लाख लोगों को रोजी मिलने का लक्ष्य अब बढाकर 50 लाख किया गया है। 
ओडिशा में वापस आनेवाले कामगारों की तुलना में कारीगर विशेष है जिन्हें सार्वजनिक क्षेत्र के स्टील प्लांट में समावेश किया जायेगा। 
श्रमिकों की घरवापसी रोकने के लिए कर्नाटक ने 15 लाख मजदूरों को प्रति व्यक्ति 2000 रुपये देने के बाद अब तीन-तीन  हजार रुपये दिया गया, जिससे निर्माण कार्य उद्योग का विकास बरक़रार रहे । 
श्रमिकों की घरवापसी- पदयात्रियों का अकस्मात 'सरकारी अनुचित व्यवस्था' की आलोचना की जा रही है लेकिन इस भगीरथ समस्या का अनुमान-कल्पना भी किसी को है?  
पिछले उन्नीस दिन में रेलवे ने 21.5 श्रमिकों के स्थानांतरण - उनके मूल राज्यों में पहुंचाया है - इसके अलावा बस और रोड मार्ग से मिलकर उत्तर प्रदेश में 18 लाख और बिहार में 20 लाख मजदूरों के पहुंचने का अनुमान है। 
भारत में - 2011 की आबादी गणना की रिपोर्ट के अनुसार 14 करोड़ श्रमिक वर्ग थे । पिछले नौ वर्ष में उल्लेखनीय वृद्धि हुई ही होगी। वर्ष 2011 से 2016 में नब्बे लाख की वृद्धि होने का अनुमान है। मुख्यतया बिहार और उत्तर प्रदेश ने देशभर में श्रमिकों की पूर्ती की है। ओडिशा, झारखण्ड का औसत कम हैण् अधिकांश श्रमिक निर्माण कार्य क्षेत्र में हैं।  
महाराष्ट्र में भूमिपुत्रों की भर्ती के लिए ब्यूरो 
महाराष्ट्र से लाखों श्रमिक अपने वतन- उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, ओड़ीशा आदि राज्यों में पलायन कर गए हैं- अभी भी कर रहे हैं, ऐसे में औद्योगिक राज्यों में कामगारों की संभावना- निश्चित ही- कमी को पूरा करने के लिए महाराष्ट्र सरकार ने तात्कालिक तैयारी शरू कर दी है। गुजरात भी इस दिशा में निश्चित और सक्रिय होगा ही। हालांकि महारष्ट्र की परिस्थिति और मनोवृत्ति अलग है। राज्य में दशकों से भूमिपुत्रों को रोजी-रोटी देने की मांग और हिंसक आन्दोलन होते रहे हैं। भूमिपुत्रों के लिए स्व. बालासाहेब ठाकरे ने सर्वप्रथम बात उठाई थी। अब मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने अवसर का लाभ उठा लिया है। संकट को अवसर बनाया जा सकता है। अलबत्ता, उन्होंने राज्य से जानेवाले श्रमिकों को सहायता और आश्वासन दिया है, जो जा रहें हैं वे सब महामारी और बेकारी के कारण जा रहे हैं- भाषा- राज्य के भेदभाव से नहीं। 
मुख्यमंत्री `ग्रीन जोन`- 'नॉन-रेड' जोन में शुरू होनेवाले नए उद्योगों में जुड़ने के लिए सलाह- आह्वान किया है। प्रधानमंत्री मोदी की बात को दोहराते हुए आत्म-निर्भर बनने के लिए चालीस हजार एकड़ जमीन का  आबंटन किया है। चीन से देशांतर कर भारत आनेवाले उद्योगों के लिए पहली पसंद महाराष्ट्र हो, उसके लिए राज्य के उद्योग मंत्री सुभाष देसाई ने जोर-शोर से तैयारी की है।  
महाराष्ट्र सरकार अब इंडस्ट्रियल एम्प्लॉयमेंट ब्यूरो शुरू करनेवाली है। राज्य में किसी भी उद्योग में कामगारों की कमी न रहे उसके लिए वर्क फ़ोर्स स्थापित किया जायेगा। इस ब्यूरो की डिज़ाइन तथा कामकाज की रूपरेखा तैयार की जा रही है। इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी विभाग द्वारा कामगारों का पंजीयन - स्किल, अन्स्किल्ड अथवा सेमि-स्किल्ड कामगारों को लिए विभिन्न क्षेत्र का प्रशिक्षण और अभ्यास काम शुरू होगा।  
इस समय उद्योगों में 80 प्रतिशत जगह भूमिपुत्रों के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है लेकिन अब उचित काम के लिए उचित कामगार मिलते रहें, ऐसी व्यवस्था की जाएगी। इस ब्यूरो की रचना- शुरू करने के लिए उद्योगपतियों, ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों तथा विशेषज्ञों से सलाह-सुझाव भी स्वागत के साथ स्वीकार किये जा रहे हैं । 
महाराष्ट्र में इस समय छोटे-मध्यम और माइक्रो उद्योगों की संख्या 120 लाख से अधिक है और 35 प्रतिशत जितने परप्रांतीय कामगार निर्माण कार्य- स्टील आदि के अलावा व्यापार- व्यवसाय- बाजारों में रोजी- रोटी से जुड़े हैं। जो लाखों श्रमिक गए हैं, उसमें से काफी तो उनके राज्य में रोजी- रोटी मिलती रहे तो भी मानसून- खेती कार्य के बाद काफी पुन: आएंगे ऐसा माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में नए उद्योगों को आकर्षित करने के लिए कानूनी सुधार हो रहा है, ऐसे सुधार की घोषणा महाराष्ट्र सरकार ने नहीं की, लेकिन देशी- विदेशी उद्योगपतियों को तात्कालिक - एक ही 'विंडो' में मंजूरी मिलने का भरोसा दिया जायेगा।  

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