देश में कपास का रकबा दो फीसदी घटने के आसार

देश में कपास का रकबा दो फीसदी घटने के आसार
मुंबई। देश में खरीफ फसल वर्ष 2020-21 (जुलाई-जून) में कपास का रकबा 124 लाख हैक्टेयर रहने की संभावना है जो पिछले फसल वर्ष की तुलना में दो फीसदी कम होगा। कपास के प्रमुख विश्लेषकों के बीच किए गए सर्वे में यह बात उभरकर सामने आई। कृषि मंत्रालय के मुताबिक वर्ष 2019-20 में कपास का रकबा 128 लाख हैक्टेयर था जबकि कॉटन एडवाइजरी बोर्ड के मुताबिक यह 126 लाख हैक्टेयर रहा। 
 सर्वे के अनुसार अधिकतर का मानना है कि कपास की कीमतों में आई तेज गिरावट से अगले सीजन में इसके रकबे में कमी आ सकती है। साथ ही कपास का पर्याप्त स्टॉक होने से भी किसान कपास की बोआई में रुचि कम लेंगे। कोरोना वायरस के फैलने एवं लॉकडाउन की वजह से टैक्सटाइल इंडस्ट्री की मांग काफी कमजोर पड़ी है। नेशनल कलेक्ट्रेल मैनेजमेंट सर्विसेज के प्रेसीडेंट अनुपम कौशिक का कहना है कि किसानों को रिटर्न बेहतर मिलने से कपास की बोआई ज्यादा प्रभावित नहीं होगी,यह अधिकतम पांच फीसदी कम रह सकती है। किसानों के पास कपास का स्टॉक सीमित होना चाहिए,हालांकि इसे बेचने में उन्हें दिक्कत हो सकती है। 
 इंडस्ट्री मानती है कि वर्ष 2019-20 सीजन में कपास का उत्पादन 360-370 लाख गांठ (प्रति गांठ 170 किलोग्राम) हुआ जबकि किसानों के पास तकरीबन 15-20 फीसदी स्टॉक बचा होगा। किसानों के पास इतना स्टॉक है तो भी उन्हें बेचने में दिक्कत आएगी क्योंकि ऊंचे भाव एवं लॉकडाउन बढ़ने से खरीद एजेंसियों और जिनर्स की लेवाली बहुत सुस्त है। एमसीएक्स कॉटन वायदा मई की शुरुआत में 14800 रुपए आ गया जो जुलाई 2015 के बाद निचला भाव है। वर्तमान में मई वायदा 15760 रुपए चल रहा है। 
 कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि महाराष्ट्र एवं गुजरात में किसान कपास की बोआई घटा सकते हैं जिसकी वजह इसके भाव कम होना है। महाराष्ट्र के किसान सोयाबीन एवं दलहन जबकि गुजरात के किसान मूंगफली की ओर मुड़ सकते हैं। हालांकि,यह परिवर्तन बड़े स्तर पर दिखाई नहीं देगा। तेलंगाना में पिछले सीजन के समान कपास की बोआई रहने की संभावना है। तेलंगाना में पिछले सीजन में 20 लाख हैक्टेयर में कपास की खेती हुई थी। बता दें कि गुजरात कपास की खेती में अव्वल है एवं इसके बाद महाराष्ट्र एवं तेलंगाना का स्थान आता है। गुजरात एवं महाराष्ट्र मिलकर देश में पैदा होने वाली कुल कपास में 50-55 फीसदी का योगदान देते हैं। 
सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन के महासचिव के सेलवाराजू का कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य आकर्षक होने एवं किसानों को इससे संरक्षण मिलने की वजह से वे कपास की खेती करना पसंद करेंगे। कपास के रकबे में हल्की बढ़ोतरी हो सकती है। मजदूरों की समस्या होने की वजह से किसान धान से कपास की ओर मुड़ सकते हैं क्योंकि बोआई के समय कपास की खेती में कम मजदूरों की जरुरत होती है। कपास में अधिक मजदूरों की जरुरत इसकी चुनाई (पिकिंग) के समय रहती है जो नवंबर से रहेगी। तब तक मजूदरों की कमी समाप्त होने की उम्मीद की जा सकती है। उत्तर भारत में कपास की बोआई शुरु हो चुकी है एवं यहां किसान धान से कपास की ओर मुड़े हैं। बता दें कि उत्तर भारत के सिंचाई वाले इलाकों में कपास की बोआई अप्रैल अंत में शुरु हो जाती है जबकि बारिश पर निर्भर इलाकों में बोआई जून में आरंभ होती है जो कुल कपास का रकबा 70 फीसदी कवर करता है। 
अमरीकी कृषि विभाग (यूएसडीए) ने भारत में कपास का बोआई अनुमान वर्ष 2020-21 के लिए 125 लाख हैक्टेयर आंका है जबकि,वर्ष 2019-20 में 133 लाख हैक्टेयर एवं वर्ष 2018-19 में126लाख हैक्टेयर में बोआई हुई थी।यूएसडीए नेवर्ष2020-21में भारत का कॉटन उत्पादन अनुमान 62.05 लाख टन आंका है जो वर्ष 2019-20 में 66.41 लाख टन आंका गया। यह उत्पादन वर्ष 2018-19 में 56.17 लाख टन,वर्ष 2017-18 में 63.14 लाख टन टन रहा।

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