युद्ध होगा? भारत के साथ अमेरिका

कोरोना महामारी के खिलाफ जंग में सफलता की शुरुवात हो रही है। जांच गहन बनने से केस की संख्या बढ़ी है, लेकिन मृत्यु कम होने से राहत है। इस परिस्थिति में लॉकडाउन में चरणबद्ध छूट देने से धंधा- रोजगार शुरू हो रहा है- मुक्त हवा का अनुभव हो रहा है- बावजूद इसके, एक बात ध्यान में रखनी होगी कि जिस तरह चीन के साथ हमारे संबंध और सरहद पर संघर्ष का अंत आसान नहीं है, उसी प्रकार चीन से आयी महामारी भी धोखेबाज है- सरहद पर हमारी सेना सज्ज और सावधान है- उसी प्रकार देशभर में लोगों को मुंह पर मास्क लगाकर दुश्मन से अंतर रखकर सावधान रहना होगा। 
रशिया की- मध्यस्थता से नहीं लेकिन सद्भावना से चीन, रशिया और भारत की त्रिपक्षीय सम्मेलन- बैठक आयोजित हुई, उसमें भारत ने दृढ़ता दिखाई। चीन ने मॉस्को में बातचीत और भारत सरहद पर सेना को तैनात करना जारी रखा है। हम जानते हैं कि दोस्ती का दावा धोखेबाजी है, अब हमने सख्त शब्दों में- साफ़ कह दिया है कि 'दादागीरी' नहीं चलेगी।  
प्रश्न यह है कि क्या आखिर में चीन के साथ युद्ध होगा कि नहीं, कब होगा यह नहीं कहा जा सकता, इससे सभी मोर्चे पर हम सज्ज हैं। इस बीच- अमेरिकी विदेश मंत्री ने महत्वपूर्ण घोषणा की है कि भारत कि सरहद पर चीन ने हिंसक  हमला व धमकी शुरू की है। इसे देखते हुए अमेरिकी सैनिकों की टुकड़ी यूरोप- जर्मनी से हटाकर भारतीय क्षेत्र में लगाना शुरू किया है। भारत के अलावा वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया- फिलीपींस का चीन के सामने सुरक्षा की चिंता और तैयारी अमेरिका की है। 
चीन ने हमारे साथ दुश्मनी लेकर भारत की दोस्ती, निष्ठा को ठुकराया है, जिससे अब संबंध सुधरने की आशा नहीं है। चीन विरोधी अमेरिकी मोर्चे का लाभ भारत को अपने आप मिलेगा। 
फिर प्रश्न यह है कि भारत को उकसाकर क्या चीन और बड़े युद्ध के लिए तैयार होगा ? ऐसी परिस्थिति में उसे रसिया का कितना साथ मिलेगा? 
इस बीच हमने चीन के माल का बहिष्कार और आयात पर निगरानी रखने कि शुरुआत की है, ऐसे में चीन को बहिष्कार की परवाह नहीं है, ऐसा तर्क दिया जा रहा है- चीन के अर्थतंत्र को अधिक असर नहीं होगा, लेकिन जीवनावश्यक सामान के निर्यात के लिए भारत विशाल बाजार है और ऐसी चीजें बनाने वाले चीन के छोटे-बड़े उद्योगों पर असर जरूर होगा। हमारे उद्योगों को कच्चे माल की कमी की चिंता है- लेकिन इसका शीघ्र आयोजन- आत्मनिर्भरता अनिवार्य है। अवसर है। चीन के साथ युद्ध न हो तो भी अब संबंध नहीं सुधरेगा, इसलिए हमें विकल्पों पर विचार कर आत्मनिर्भर हो जाना चाहिए। 
भारत- चीन मुक्त व्यापार के लिए मिला अनुदान  
चीन के माल का बहिष्कार अब गंभीर स्वरूप ले रहा है, लेकिन हमारे बंदरगाहों पर आयातित माल का ढेर लगाना शुरू हो गया है- पर्याप्त जांच हो रही है लेकिन 2005 में राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन के वामपंथी पक्ष से तीन लाख अमेरिकी डॉलर का 'अनुदान' मिला था और वह भी चीन के साथ 'मुक्त व्यापार' का अध्यन कर रिपोर्ट देने के लिए- यह बात मानी जाती है? लेकिन हकीकत है। अब राहुल गांधी प्रधानमंत्री मोदी पर मनमर्जी से आरोप लगा रहे हैं, ऐसे में चीन का धन स्वीकार किया गया था इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं होता और वर्ष़ों पुरानी बात का क्या मतलब? ऐसा कहा जा रहा है! यह विवाद भी आसानी से भुलाया नहीं जाएगा- संसद में अधिक गूंजेगा। चुनाव के पहले राहुल गांधी चीनी अम्बेस्डर को मिले थे, तब यह विवाद उठा था लेकिन अब धन की बात है। राहुल गांधी मोदी को निशाने पर लेकर प्रहार कर रहे हैं यह व्यूहात्मक है। राजनीतिक मैदान में मोदी को चुनौती देने वाला एक मात्र नेता कांग्रेस प्रमुख बनने को तैयार है- पुराने लोगों को हटाकर 'राहुल कांग्रेस' की तैयारी है। लेकिन युवा कांग्रेसियों के एक वर्ग ने विचारशील मिलिंद देवरा को 1975 की इमरजेंसी की बरसी पर `याद' किया है। राजनीतिक पक्ष में भी लोकतंत्र के लिए निष्ठा, त्याग और प्रामाणिक आत्मपरीक्षण होना चाहिए।  

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