सोया, पामतेल के साथ अन्य खाद्यतेलों में भी तेजी

सोया, पामतेल के साथ अन्य खाद्यतेलों में भी तेजी
हमारे संवाददाता 
इंदौर। पिछले वर्ष सोयातेल 750 से  उछलते हुए वर्तमान भाव 845 रु. और पामतेल  कोविड पीरियड में  दो माह पूर्व  670 रु. तक हो गया था जो  उछलते हुए 810 रु. तक वर्तमान में थोक में हो गया है। व्यापार की महिमा आम जनता की लिये आश्चर्य भरी होती जा रही है। अर्थात् 20-25 प्रतिशत की वृद्धि खाद्यतेलों में रही है। तिलहनों के उत्पादनों में कमी नहीं आई है। चीन के कोरोना वायरस प्रभाव का असर पूरे विश्व में डर सा समाया होन से  व्ययसाय पर भारी प्रभाव होना बताया रहा है। पामतेल का चीन तरफ निर्यात बंद होना और चीन से वहां के उत्पादों का निर्यात प्रभाववित हाने से दुनियाभर में कारोबार में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव आना बताया गया है।  चार माह पूर्व तक सोयातेल और पामतेल के भावो में गहराती मंदी का कारण कोरोना वायरस से देखा गया था।  जबकि  छोटा व्यापारिक क्षेत्र यह मानता है कि भारत में सोयातेल के इस वर्ष जनवरी / फरवरी में बढ़े भाव 950 रु. तक एक अप्रत्याशित सट्टा तेजी थी। जिसमें ऊंचे भाव पर मांग में आई  भारी कमी से भावों का गिरना बताया गया।  पूर्व में चीन के पाम तेल की भारी मांग ने  वैश्विक तेजी ला दी थी जिसके अनुसारण में भारत में ही सोयातेल पर भारी तेजी दी थी। विगत एक वर्ष में कुछ राजनैतिक कारणों से भारत में पाम तेल सीधे मलेशिया से आयात नहीं होते हुए नेपाल के रास्ते आयात हो रहा बताया जा रहा था। अभी वर्तमान में चीन की  पामतेल मांग में कमी है मगर मलेशिया में राजनैतिक परिवर्तन से भारत के साथ आई संबंधों में शिथिलता के कारण आयात आयतकों के साथ बहाल हुआ बताते है। मलेशिया, इंडोनेशिया में निर्यात मांग बढ़ने वैश्विक सट्टे में पुन: पामतेल की तेजी बहाल हुई। इससे  पामतेल और सोयातेल के हाजिर सट्टे भी तेज होने लगे है। व्यापार जगत के दिग्गज विश्लेषकों का मानना है कि  भारत में पामतेल भाव और सोयातेल भाव में कोई अंतर नहीं रह जाने से यहां के सोया उद्योगों का चलन प्रभावित हो सकता है। भारत में  पामतेल का अधिकता में आयात होना ही सोया उद्योगो में उद्योगपति बाहर होते जा रहे है। कई प्लांट सोया के उत्पादन में कमी कर चुके है। इसके पीछे उनका मानना है सोयाबीन के बढ़ते भाव और पामतेल का अधिकता में आयात होना है। हालांकि कृषकीय विशेषज्ञों के अनुसार गत् वर्ष सोयाबीन का उत्पादन 95-100 लाख टन से कम नहीं हुआ है और कृषकों के लिये कामधेनु बनी सोयाबीन का उत्पादन  पिछले दशकों के मुकाबले बढ़ता ही रहा है। इस वर्ष भी सोयबीन रकबे में कमी नहीं आएगी।  मानसून प्रगति अच्छी रही तो पिछले वर्ष से अधिक ही उत्पादन आगामी खरीफ फसल में होगा एसी धारणा है। गत् हप्ते हालांकि अतंर्राष्ट्रीय स्तर मलेशियन पामतेल वायदा केएलसीई में कोई तेजी नहीं हुई। गत् हप्ते बुधवार - गुरुवार को मंदी में होना बताया जा रहा था। वही शिकागो सोयातेल वायदा में भी मंदी थी।  पर भारत में  पाम तेल 815 रु. और और सोयातेल 850 रु. पर तेजी रही है। इसके प्रभाव से मूंगफली तेल भी 1360-1380 रु. पर रहा। बहरहाल, सोयाबीन की मंदी आने के बाद से माल का मंडियों में आना कम हो गया था। पुन: तेज होने से मंडी आवक मात्रा बढ़ी बताते है। सोयाबीन थोक मंडी भाव 3600 से 3800 रु. तक क्वालिटी मुजब होना बताया जा रहा था। वर्तमान में देश का जरूरत है अधिक से अधिक स्टार्ट युवाओं को प्रोत्साहन की। अत: सोया उद्योगों और अन्य उद्योगों में चालू  प्रभावशाली उद्योगपतियों की आंखों से उद्योगों को निकलकर नये उद्यमकर्मियो को उत्पादन कर्ता बनाना चाहिये। तब ही भारत मेक-इन-इंडिया नहीं मेड-इन- इंडिया बन सकेगा।   
जनता की मुखाग्र शक्ति की सुने तो उनका कहना भी उचित है कि, पिछली 20 वी सदी में और 21 वी संदी के कुछ वर्ष़ों तक भारत में वनस्पति घी डालडा मार्का का बोलबाला था। पिछले कई वर्ष़ों से वनस्पति घी उद्योग बंद हो गये है। पाम तेल के चलन और भारतीय बाजार में नकली शुद्व देशी घी से पट पड़ा बाजार का, कहीं संबंध वनस्पति उद्योगों के बंद होने से तो नहीं है? पामतेल का भारत में अधिक चलन और तैयार शुद्व घी जो कि ऐसेंस युक्त होना बताया जा रहा है। नकली देशी घी की उत्पादन लागत 70-100 रु. किलो है तो वनस्पती घी का बनाने का भार उत्पादक क्यों लें। शुद्व देशी घी मार्केट में 450 से 500 रु. किलो तक बिक रहा है। भारी मांग राजनैतिक दलों और अखाड़ों के भंडारों की बढ़ती जा रही है तो फायदा किसमें है? सवाल अधिक प्रभावशाली है।  सोयाबीन की प्लांट डिलीवरी 3750-3850 रु. तक होना बताई जा रही है। 

© 2020 Saurashtra Trust

Developed & Maintain by Webpioneer