वैश्विक मांग में कमी से खाद्यतेलों के भाव घटे

हमारे संवाददाता
इंदौर । गत् हप्ते गिरती व्यापारिक मांग से खाद्य तेलो पर मंदी रही । कोविड कहर के कारण इस वर्ष अभी घरेलूस्तर जनता का आचार की तरफ ध्यान नही होना बताया जा रहा है इससे उपभोक्ता मांग में भी कमी आई बताई जा रही है । दूसरी व्यापारिक क्षैत्रो के अनुसार तरफ वैश्विक स्तर पर पाम तेल की मांग में आई कमी और वायदा बाजार के गिरने से भावो में मंदी आना बताया जा रहा है । गत् हप्ते मलेशियन केएलसीई और शिकागो सोया तेल इंडेक्स में गिरावट बनी रही । बुघवार को भी केएलसीई नीचे-उपर होकर अंत में 32 पाइंट की गिरावट होकर बंद हुई । कामोबेश यही हाल शिकागो सोया तेल वायदा मे था जो 31 पाइंट मंदी में बंद हुआ बताया गया । बाद के दिनो में भी गिरावट की ही धारणा बताई जा रही थी । मुंगफल तेल के भाव अच्छे उपजने और मुंगफली के भाव भी कृषको ं को अच्छे उपजने से इस वर्ष भी मुंगफली का रकबा बढ सकता बताया जा रहा है । गुजरत तरफ अच्छी बोउनी हुई बताया जा रहा है । गत् वर्ष के मुकाबले इस वर्ष भी आगे उपज बढने की संभावना बताई जा रही है ।  
 भारत में खाद्य पदार्थो पर पिछले दो दशकों में यह देखने में आया है कि खाद्य पदार्थो पर कई सवाल खडे होने लगे है । जैसे कि नकली,मिलावाट,उत्पादन,खपत और उस पर आयात-निर्यात, सटट्,ा भाव ? आयात-निर्यात शुल्क घटे,बढें क्यों ? इन सवालों के खडे होने पर क्या दोषी जनता है या उद्यााथगपति ? अगर जनता शुद्ध खा रही है तो देश में बीमारियों और बीमारो की लाईन क्यों ? जनता के विश्लेषाको की वॉकपटुता के अनुसार , वर्तमान में देश में अर्थराईटिय और केंसर का ग्राफ दुनिया के तीसरे देशों से अधिक है । तो क्या इसमें नकली और मिलावट का दोष है या जनता की जीवनशैली ? बढती पगारे और बढते वैभव से अगर जीवनशैली पर गौर करे तो जनता शुद्ध खाकर कमजोर या सुस्त हो सकती है मगर केंसर और अर्थराईटिस बीमारी का ग्राफ नही बढा सकती है । उनके अनुसार इतने बीमार तो जब भी नही थे जब हमारे देश से निर्यात और आयात का अधिक खेल नही होता था । यदि होता भी रहा है तो देश में मिलावट या रि-पेकिंग करने पर उद्योगपतियो पर जनता की बीमारी और सरकार का डर था । शायद आज वो नही है । देश में दूध का उत्पादन क्या इतना होता है कि उपभोक्ताओं की जरूरत के बाद दूध के मिठाई और परवर्ती उत्पपाद देश में इतने उत्पादित हो सकते है ?तो क्या दूध के परवर्ती उत्पादो में खाद्य तेलो का सम्मिश्रण और अन्य खाद्य पादार्थो की मिलावट से बन रहे है । देश में बढ रही बीमारियो के ग्राफ का दोषी कौन ? पेकिंग मटेरियल पर जांच की पैनी नजरे क्यों नही ? पेकिंग और शुद्ध के नाम पर भाव बढे चले जा रहे है । देश में पचास की दशक के पैदावार वाली जनता जिन्होने तीन रू. किलो का का खाद्य तेल और सात रू. किलो का शुद्ध घी खाया है । वे यही कहेंगे कि आज मुंगफली तेल और सरसों के तेल तथा शुद्ध घी की वो सौरभ और ताकत नही है जो पहले हुआ करती थी । अर्थात नकली या घालमेल का तेल है । जबसे सोयातेल की पैदावार बढी घालमेल बढ गये । इसके बाद आया सबसे कमजोर नीचली जाति का पाम तेल और घालमेल बढ गया । देश में बढ रही बीमारियां और इनकी बढती इतनी खपत तो यही बता रही है । 
बहरहाल गत् हप्ते भाव मे मंदी रही । छोटे व्यापारियो से ली गई जानकारी के आधार पर खपत में लॉकबंदी में आई भारी कमी तथा तथा स्टॉक में पडे माल पर तेजी कर उद्योगो ने लॉकबंदी में हुए अपने नुक्सान की भरपाई का करना बताया जा रहा है । लॉकबंदी के पूर्व सोया तेल का भाव 775 रू था तथा लॉकबंदी में अचानक भाव 710 रू तक गिरे । उद्यााथगो को अवसर मिला जिसमें हाजिर बाजार की तेजी हुई और भाव सोया तेल 850 रू तक पहुंच गया था । उंचे भाव पर आई कमी या मुनाफा वसूली होने क बाद धीरे धीरे मंदी होकर भाव गत् हप्ते 810 रू तक होना बताए जा रहे थे ।  मंदी के पीछे पाम तेल उत्पादक देशो में निर्यात शुल्क जीरो और वहां से भारी निर्यात होना है । कृषि क्षैत्रो से मिली खबरो के अनुसार खेतो मे सोयाबीन की बोउनी लगभग 70 प्रतिशत तक हो गई बताया जा रहा है । थोक मंडियो मे पुरानी सोयाबीन लगभग 1200 से 1500 बोरियो की आवकें हो रही है बताया गया । भाव क्वालिटी मुजब 3500 से 3650 रू । प्लांटो की खरीदी भी इसी भावपर हो रही बताया जा रहा है । सोया उद्यााथगो के पास तेल स्टॉक में कमी नही बताई जा रही है । गत् हप्ते इंदौर मुंगफली तेल 1360 रू , मुंबई मुंगफली तेल 1340 रू, गुजरात लूज सोया तेल,1330रू और तेलिया का भाव 2105 रू तक रहा । इंदौर सोया तेल 815, साल्वेंट 765 रू, मुंबई सोया तेल 805 और पाम तेल 760 रू इंदौरपाम तेल 780रू भाव था।

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