जीरे के भारी स्टॉक से भाव पर असर

जीरे के भारी स्टॉक से भाव पर असर
मुंबई। जीरे की इस साल खपत बढ़ने के बावजूद इसके भावों पर दबाव बना हुआ है एवं चालू मार्केटिंग वर्ष के अंत में भारी भरकम स्टॉक बचने के भय से कीमतें और टूटने से इनकार नहीं किया जा सकता। जीरे के मौजूदा हालात को देखते हुए यह इस साल बॉटम भाव बना सकता है, जो अगले दो तीन साल नहीं टूटेगा। जैसा कि इसने वर्ष 2014 में बनाया था। 
देश में इस साल जीरे की उपज कारोबारी अनुमान के मुताबिक 95 लाख बोरी (प्रति बोरी 55 किलोग्राम) रही जबकि पुराना जीरा तकरीबन दस लाख बोरी से कम नहीं था। इस तरह जीरे की कुल उपलब्धता चालू मार्केटिंग वर्ष में 105 लाख बोरी से कम नहीं है। इसकी खपत आम तौर पर 60 लाख बोरी रहती है लेकिन बढ़ते निर्यात की वजह से यदि इसे 70 लाख बोरी भी मान लिया जाए तो भी अंतिम स्टॉक 35 लाख बोरी रह सकता है। गुजरात एवं राजस्थान के जीरा उत्पादक इलाकों में इस साल अच्छी बारिश हुई है लेकिन इसकी बोआई घटेगी या बढ़ेगी, इसके बारे में कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगी। जीरे की बोआई अक्टूबर से नवंबर के दौरान होती है जबकि इसकी कटाई फरवरी से मार्च में होती है। गुजरात एवं राजस्थान में हुई अच्छी बारिश के बाद यह माना जा रहा है कि रबी सीजन में जीरे की बोआई बढ़ेगी, हालांकि इसे अजवायन, ईसबगोल, मेथी, सरसों और चने से प्रति स्पर्धा करनी होगी क्योंकि किसान अच्छे रिटर्न की वजह से उन फसलों का चयन करेंगे जो उसे अधिक लाभदायी लगेगी। इस बार रबी फसल के समय किसान के पास खूब विकल्प हैं और वह जीरे की बोआई भाव नीचे रहने पर घटा भी सकता है। 
इस साल की पहली तिमाही में जीरा 15850 रुपए की ऊंचाई से 12750 रुपए तक आ गया था। वर्तमान में देश की सबसे बड़ी जीरा मंडी में ऊंझा में अच्छा जीरा 13500 रुपए और हल्की क्वॉलिटी का जीरा 11000 रुपए प्रति क्विंटल बिक रहा है। कारोबारियों का कहना है कि जब जीरे का अंतिम स्टॉक दो से पांच लाख बोरी बचता है तब भी इसमें तेजी सीमित आती है तो इस साल अंतिम स्टॉक की गणना अभी से भयभीत कर रही है। यदि किसान अगली रबी फसल में जीरे की बोआई घटाते भी है तो यह 60-70 लाख बोरी से कम नहीं होगा। इतना उत्पादन भारत में सामान्य हो गया है। इस तरह, इसके साथ अंतिम स्टॉक को जोड़ लिया जाए तो अगले मार्केटिंग वर्ष में भी जीरे की उपलब्धता कम नहीं होगी जो जोरदार मांग के बगैर इसके भाव ऊपर नहीं उठने देगी। वर्ष 2014 में जीरे की फसल 50-55 लाख बोरी थी लेकिन जीरे ने 8000-8500 रुपए प्रति क्विंटल का बॉटम भाव बनाया था। जीरे के बॉटम भाव बनने की वजह भारी भरकम पुराना स्टॉक था। इस साल भी वर्ष 2014 जैसे ही हालात बनते नजर आ रहे हैं। 
बता दें कि मानसून के सीजन में सितंबर तक जीरे में हर साल मांग कमजोर रहती है क्योंकि मानसून के सीजन में नमी बढ़ने की वजह से इसके सौदे कम होते हैं। जबकि, अक्टूबर तक अधिकतर कारोबारी एवं किसान अपने पास रखे जीरे को बेचने में लगे रहते हैं। किसान नई बोआई से पहले मौसम एवं खेतों का मुआयना करने के बाद पिछले जीरे को बेच देता है। इस साल अच्छी बारिश होने से जमीन में नमी की कमी नहीं है, साथ ही जीरा उत्पादक इलाकों में सिंचाई के लिए पानी की कमी नहीं है। इसके अलावा जीरे की फसल को पानी भी कम चाहिए जिसकी कोई दिक्कत इस साल नहीं होगी। किसान एवं स्टॉकिस्टों ने यदि अगले महीने मंडियों में आवक बढ़ाई तो दिवाली के बाद जीरा नया निचला भाव दिखा सकता है। 
खासे उत्पादन के बीच, भारतीय जीरे के लिए निर्यात मोर्चे पर इस साल अच्छी खबर है। दूसरी ओर, देश से फरवरी 2020 से जुलाई 2020 के दौरान साबुत जीरे का निर्यात 145150 टन रहा जो फरवरी 2019 से जुलाई 2019 के दौरान 121268 टन था। बता दें कि भारतीय जीरे के सबसे बड़े ग्राहक चीन, वियतनाम, बांग्लादेश, अमरीका, इजिप्त, पाकिस्तान, सऊदी अरब, श्रीलंका, नेपाल, ब्राजील, मलेशिया एवं पेरु आदि हैं। 
फैडरेशन ऑफ इंडियन स्पाइस स्टेकहोल्डर्स ने देश में वर्ष 2020 में जीरे का उत्पादन 9736282 बोरी (प्रति बोरी 55 किलोग्राम) होने का अनुमान जताया है। यह उत्पादन पिछले रबी सीजन 2019 में 7574527 बोरी था। इस तरह उत्पादन में 29 फीसदी का इजाफा होने के आसार हैं। हालांकि, प्रति हैक्टेयर यील्ड पिछले साल की तुलना में तीन फीसदी बढ़कर 522 किलोग्राम रहने का अनुमान है।

© 2020 Saurashtra Trust

Developed & Maintain by Webpioneer