जय जवान, अब जय किसान...

कृषि क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार वाले दो विधेयक अब लोकसभा में पारित हो जाने के बाद 'एक देश और एक बाजार' का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इस सुधार का लाभ किसानों और व्यापारियों के साथ ग्राहकों को भी मिलेगा। अनाज व्यापार में जो पुराने लोग हैं उन्हें अनाज की जोनबंदी, कालाबाजार और भ्रष्टाचार याद होगा। हरित क्रांति और रिकॉर्ड उत्पादन के बाद भारी राहत मिली है। इसके बावजूद कृषि सुधार अनिवार्य था। कांग्रेस द्वारा 2019 के चुनाव के समय ऐसे सुधार का वचन देने के बाद अब राजनैतिक उद्देश्य से सुधार का विरोध कर रहे हैं। पंजाब और हरियाणा में किसानों ने विरोध किया है और अकाली दल की बुनियाद में किसानों और आढ़तियों का समर्थन है, अब अकाली दल के वोट बैंक पर कांग्रेस के मुख्यमंत्री कॉप्टन अमरिंदर सिंह कब्ज़ा करना चाहते हैं, इससे मोदी सरकार से हरसिमरत बादल ने त्यागपत्र दिया है और मोदी सरकार को समर्थन देने की घोषणा की है। 
जो सुधार हुआ है उसके अनुसार किसान और व्यापारी एपीएमसी- राज्य के बाजार से बाहर- देश में चाहे वहां कृषि उत्पाद बेंच सकते हैं। अंतर- राज्य मुक्त व्यापार होगा। किसानों को उचित- भाव मिल सकेगा। इलेक्ट्रॉनिक- ई-व्यापार की सुविधा मिलेगी और भ्रष्टाचार से मुक्ति मिलेगी। देश में एक हजार जितनी मंडियां ई-प्लेटफार्म पर आने के बाद 35,000 करोड़ रुपये का व्यापार हुआ है। अब ई-व्यापार को अधिक प्लेटफार्म की सुविधा मिलेगी और किसानों को तीन दिन में रकम का भुगतान होगा। 
दलहन- अरहर दाल, तिलहन और प्याज- आलू का भाव बढ़ने का शोर समय- समय पर सुना जाता है और उसका असर राजनीति पर पड़ता है। अब आवश्यक चीज- वास्तु कानून से मुक्ति मिली है- अर्थात स्टॉक लिमिट रद्द हुई है। असाधारण परिस्थिति में ही स्टॉक सीमा निश्चित होगी। निजी क्षेत्र की कंपनियां और विदेशी पूंजी निवेश के लिए द्वार खुलेगा, जिससे स्पर्धा का लाभ ग्राहकों को मिलेगा। 
लॉकडाउन के संकट समय में देशभर में साग- सब्जी और प्याज- आलू के भाव वृद्धि की मार लोगों पर पड़ी है। प्याज का भाव अधिक न बढे उसके लिए केंद्र सरकार ने निर्यात बंदी की तो महाराष्ट्र में विरोध हुआ। शरद पवार ने प्रधानमंत्री के समक्ष मांग की। हालांकि अब विधेयक कानून बने उसके बाद ही स्टॉक लिमिट रद्द होने से निर्यात बंदी का अर्थ नहीं, ऐसा माना जा रहा है। 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले दस वर्ष से कहते रहे और घोषणा पत्र में भी वचन दिया गया है, कृषि सुधार की सिफारिश स्वामीनाथन भी करते रहे। अंतत: अमल हो रहा है। लॉकडाउन और आर्थिक परेशानी, श्रमिकों का पलायन और बेकारी में कृषि क्षेत्र के- अनाज से भरे भंडार ने बड़ी राहत दी है यह कैसे भुलाया जा सकता है। इस सुधार से कृषि क्षेत्र अधिक शक्तिशाली बनेगा और जय जवान के साथ जय- किसान- के सूत्र को बुलंद किया जायेगा। 
पंजाब में 12 लाख कृषि परिवार हैं और 28 हजार आढ़तिये हैं और ऐसी धमकी दी गयी हैं कि जो भी और नेता कृषि विधेयक को समर्थन देंगे उनका बहिष्कार होगा। ऐसी परिस्थिति में अकाली दल के पास विकल्प नहीं था। अलबत्ता चुनाव आएगा तब तक कृषि सुधार का फल मिलने लगेगा लेकिन आढ़तियों की ढाई प्रतिशत कमीशन की कमाई बंद होगी। फ़ूड कारपोरेशन द्वारा पंजाब- हरियाणा में गेहूं- चावल से होती प्राप्ति- खरीदी पर आढ़तियों का आधार होता है। 
पंजाब- हरियाणा के अलावा अन्य राज्यों में सुधार विरोधी आंदोलन नहीं फैला, इसका कारण है कि आढ़तियों का प्रभाव नहीं है। 
जमीन सुधार की तरह कृषि सुधार के विरोध में राजनीति है, कृषि अर्थकारण नहीं है। ऐसा प्रचार हुआ कि किसानों को जो उत्तम समर्थन मूल्य मिलता है वह अब बंद होगा। वास्तव में संसद ने आश्वासन दिया है और कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर ने पत्र लिखकर भी भरोसा दिलाया है कि समर्थन मूल्य बंद नहीं होगा लेकिन राजनैतिक विरोध और प्रचार हुआ।   

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