कश्मीर में नई चुनौती

विदेशों- विशेषकर यूरोप के देशों में कोरोना का दूसरा राउंड शुरू हो गया है ब् फ्रांस- जर्मनी में कर्फ्यू और ब्रिटेन में भी सख्त नियंत्रण घोषित किया गया है तो अपने देश में स्थिति सुधर रही है। लॉकडाउन चरणबद्धरूप से उठाया जा रहा है और दिवाली तक अर्थव्यवस्था की गाड़ी पटरी पर मंद गति से शुरू होने की आशा है। सरहद पर तनाव यथावत है- चीनी प्रमुख ने सेना' को 'तैयार' रहने का आदेश दिया है, लेकिन नवंबर में अमेरिकी प्रमुख का चुनाव परिणाम आये उस पर लद्दाख सरहद की स्थिति का आधार होगा। प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रम्प पुन: सत्ता प्राप्त करें तो चीन को युद्ध टालने पर विचार करना होगा। इस समय भारत भी मजबूत है और जहां तक चीनी सेना और शस्त्र- असबाब का ढेर नहीं हटाती वहां तक भारतीय सेना भी जो शिखर सर किया है वह नहीं छोड़ेगी।'
सरहद पर सेना और सरकार मजबूत है तो हमारे विपक्षी नेता सरकार के लिए अधिक समस्या सर्जित कर रहे हैं। बिहार विधानसभा के चिनाव में विजय की आशा न होने के बावजूद सेक्युलरवाद पुन: जगाने का प्रयास शुरू हुआ है और दूसरी तरफ हिंदुत्व की स्पर्धा करना चाहते हैं!''
जम्मू- कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्रियों - फारुख और उम्र अब्दुल्ला तथा महबूबा मुफ़्ती 'नजरबंदी' से छूटने के बाद केंद्र सरकार के सामने- और भारत के खिलाफ बगावत करने को तैयार हुए हैं। फारूख अब्दुल्ला ने तो यहां तक कह दिया है कि 370 धारा वापस लाने के लिए चीन कि मदद मिलेगी। क्या मुफ़्ती महबूबा भी कश्मीरी एकता के नाम पर बगावत में जुड़ेंगी? या भारत के आंतरिक मामलों में चीन कि दखलंदाजी को इंकार करेंगी? कश्मीर में 370 धारा के बहाने एकता और अलगाववाद पुन: सिर उठा रहा है। भारत सरकार अब चुनाव- आगामी मार्च में करा सकेगी या फिर अलगाववादियों के सामने सख्त कार्रवाही होगी? संयोगों पर आधार होगा- लेकिन चीन और पाकिस्तान सरहद का प्रश्न साथ- साथ रहेगा।'
फारूख अब्दुल्ला के दिल और दिमाग के शब्द होंठ पर आये हैं। भारत में दशकों तक सत्ता का भोग किया- तीसरी पीढ़ी तक मुख्यमंत्री रहे। कश्मीर की तबाही होती गयी, लद्दाख और जम्मू को अन्याय और पंडितों को अत्याचार सहन करना पड़ा तो मात्र 'कश्मीरियन' की बात थी- अब जम्मू- लद्दाख को न्याय देना है! भारत के दुश्मन को दोस्त बनाया है-!''
फारुख के इस वक्तव्य के सामने कांग्रेस तथा अन्य किसी पार्टी के नेताओं ने एक शब्द भी नहीं बोला! सत्ता के स्वार्थ में ये नेता देशाभिमान और देशहित को क्या बलि देने को तैयार हैं?' संसद और गलियारों में कहने और बोलने के शब्द अलग हैं!'
पाकिस्तानी एजेंसी - आईएसआई ने सोशल मीडिया पर ऐसी हवा फैलाई है कि 1965 के युद्ध के समय भारतीय सेना की 'मुस्लिम रेजिमेंट' ने पाकिस्तान के खिलाफ लड़ने से इंकार कर दिया था! वास्तव में हमारी- भारतीय सेना में मुस्लिम रेजिमेंट- अथवा किसी धर्म के नाम पर रेजिमेंट है ही नहीं। जान-बूझकर वर्ष 2013 में- चुनाव के समय हिन्दू- मुस्लिम का मुद्दा जगाकर 'सेक्युलरवाद' को मदद करने का इरादा था- जो निष्फल रहा। अब पुन: ऐसा असफल प्रयास हो रहा है। भारतीय सेना को मुस्लिम सैनिकों और अफसरों का गौरव है और उनका सम्मान भी किया जाता है।'
फेसबुक- ट्वीट पर होते दुप्रचार को रोकने की मांग की गयी है।

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