कमरे के तापमान पर कुछ ही मिनटों में होगा सिंथेटिक हीरे का उत्पादन

कमरे के तापमान पर कुछ ही मिनटों में होगा सिंथेटिक हीरे का उत्पादन
ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों की अद्भुत खोज
मधु बारभाया 
प्राकृतिक हीरे को आज दुनिया में सबसे लक्जरी आइटम माना जाता है। सभी को हीरे पसंद हैं, लेकिन हर कोई प्राकृतिक हीरे खरीद नहीं सकता है, तब सस्ते और सभी ले सके एसे हीरे बनाने के प्रयास 1950 के दशक से चल रहे हैं। इस स्थिति के बीच, एक ऑस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने कमरे के तापमान पर मिनटो के अंदर कृत्रिम हीरे बनाकर एक आकार्य पैदा किया है। 
प्रकृति में, हीरे पृथ्वी की पपड़ी के नीचे अरबों साल पहले तीव्र गर्मी और दबाव की स्थिति मे गठन हुए है। आमतौर पर, हीरे पृथ्वी की सतह से नीचे लगभग 150 से 200 किलोमीटर की गहराई पर बनते हैं, जहाँ तापमान औसतन 900 से 1300 डिग्री सेल्सियस और दबाव सतह से 50000 गुना अधिक होता है। यही कारण है कि हीरे इतने लोकप्रिय हैं, उन्हें विशेष परिस्थितियों में बनाने में लाखों साल लगे होते हैं। 
लेकिन अब, ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों का दावा है कि वे कुछ ही मिनटों में हीरे बना सकते हैं - और कमरे के तापमान पर। 
चूंकि हीरे इतने दुर्लभ है, इसलिए भौतिकविद सिंथेटिक हीरे बनाने के तरीके विकसित करने की मांग कर रहे थे। केवल 1950 के दशक में स्वीडिश और अमेरिकी वैज्ञानिकों ने खोजा था कि ग्रेफाइट और पिघले हुए लोहे को कैसे सिंथेटिक हीरे में बदले और जूल्स वर्ने की साहित्यिक भविष्यवाणियों को पूरा करे। 
उद्योग में सिंथेटिक हीरे बनाने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली सबसे आम पध्धति को उच्च दबाव, उच्च तापमान (एचपीएचटी) कहा जाता है। एचपीएचटी के दौरान, अरबों साल पहले हीरे में बदलते कार्बन को, कार्बन के समान उच्च तापमान और दबाव दिया जाता है। 
ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्रीय विश्वविद्यालय (एएनयू) और मेलबर्न की आरएमआईटी विश्वविद्यालय के भौतिकविदों ने अपने नए अध्ययन में खुलासा किया है कि वे कैसे दो प्रकार के हीरे बनाते हैं। एक प्रकार मे गहने में इस्तेमाल किए जाने वाले हीरे होते हैं, दूसरा सामान्य प्रकार की तुलना में कठिन होता है जो कि एक प्रकार के उल्का-पिंड के प्रभाव में बनता है, जिसे लोन्सडेलाइट कहा जाता है। 
आकार्यजनक बात ये है कि दोनों प्रकार के हीरे कमरे के तापमान पर ऑस्ट्रेलियाई भौतिकविदों द्वारा उत्पादित किए गए थे, जो एक बड़ी उपलब्धि है, विशेष रूप से दुर्लभ लोन्सडेलाइट प्रकार के लिए, जो सामान्य हीरे की तुलना में 58% कठिन होते है। हालांकि, भौतिकविदों को कार्बन परमाणुओं पर बहुत अधिक दबाव डालना पड़ा था। 
एएनयू के प्रोफेसर जोड़ी ब्रैडबी ने कहा था कि महत्वपूर्ण बात यह है कि हम इतने दबाव को कैसे लागू करते हैं। `बहुत उच्च दबाव के साथ, हम कार्बन पर 'शीअर' नामक एक बल का प्रयोग करते हैं, जो हमें लगता है कि इस से कार्बन परमाणुओं को अपनी जगह से स्थान परिवर्तन करने का और लोन्सडेलाइट और साधारण हीरे बनाने का अवकाश मिलता है।` 
हीरे मे से छोटे टुकड़ों को काटकर इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप के नीचे रखा गया था ताकि शोधकर्ता इसकी रचना को और यह कैसे बनता है इसे बेहतर ढंग से समझ सकें। 
इस सिंथेटिक हीरे का उपयोग गहनों में करने के लिए नहीं है, हालांकि सगाई की वीटी में इसका उपयोग करने में कुछ गलत नहीं है। हालाँकि इन हीरों का उपयोग औद्योगिक खपत के लिए है जहाँ सख्त सामग्री को काटने की आवश्यकता होती है या सुरक्षा कवच के रूप में उपयोग करने की आवश्यकता होती है।

© 2021 Saurashtra Trust

Developed & Maintain by Webpioneer