व्यापारियों को उद्धव सरकार की तरफ से निराशा

संघठनों द्वारा फर्ज निभाने के बावजूद उनकी बात नहीं सुनी गई 
लॉकडाउन की बिडंबना यह है कि इसमें मध्यमवर्ग आर्थिक रूप से टूटता जा रहा हैं फिर चाहे सामान्य जनता हो या व्यापारी! 
महाराष्ट्र में 30 अप्रैल तक लॉकडाउन जैसे नियंत्रण मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने लागू किया उसके साथ फेरीवाले, रिक्शावाले और रोज कमाने वाले जैसे असंघठित और आर्थिक रूप से कमजोर ऐसे सात करोड़ अस्सी लाख जनता के लिए 5478 करोड़ रूपये की सहायता घोषित की गई है, लेकिन व्यापारियों के लिए कोई घोषणा नहीं की गई है व्यापारी संघठनों की मांग थीं कि कम से कम प्रापर्टी टेक्स, प्रोफेशनल टेक्स, लाइट बिल की वसूली से मुक्ति दी जानी चाहिए। सरकार ने व्यापारियों के समक्ष मीटिंग में अपनी आर्थिक हालत का रोना रोया। आगामी महीना कौन जाने, लेकिन इस महीने के अंत तक व्यापारियों का धंधा- व्यवसाय निश्चित रूप से बंद रहेगा छोटे व्यापारियों की दशा मध्यमवर्ग के लोगों जैसी अत्यंत दयनीय है। वह किसी के पास हाथ नहीं फैला सकते हैं और उनके वोट की इस समय राज्यसरकार को जरूरत नहीं है। छोटे व्यापारियों का धंधा बंद है बावजूद इसके उन्हें कर्मचारियों को वेतन देने के अलावा उनका घर खर्च निकालना और लॉकडाउन के दौरान उपयोग ना किया तो भी प्रापर्टी और बिजली बिल सरकार उनके पास से किस तरह वसूल कर सकती है? 
व्यपारी संघठन मात्र इतना ही आश्वासन ले सकते हैं कि अमेजॉन, फ्लिपकार्ट जैसी ई-कॉर्मस कंपनियों को गैर आवश्यक चीजों की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है उसके कारण ई-कॉर्मस मार्केट प्लेट्स को दुकानदारों के सामने जो विशेष लाभ मिलता था वह अब नहीं रहा लेकिन कोई समाधान नहीं। इसके बदले व्यापारियों और ई-कॉर्मस कंपनियों को नियंत्रण के साथ आवश्यक और  
गैरआवश्यक चीजों की व्यापार करने की मंजूरी दी होती तो व्यापारियों को न्याय मिला कहा जा सकता है।  
यहां पर प्रश्न यह है कि उध्दव सरकार क्या व्यापारियों के आर्थिक योगदान को अथवा उनके सहकार्य के रूख के मूल्य को कम आंक रही है? व्यापारी संघठनों की मांग असरकारक नहीं? सरकार को यह भूलना नहीं चाहिए कि 30 अप्रैल तक दुकानों और बाजारों को बंद रखने के आदेश दिए गए तब राज्य के अनेक शहरों में व्यापारियों का पुण्यप्रकोप निकलकर बाहर आया था व्यापारियों ने सविनय कानून भंग करने की चेतावनी दी थीं तब मुख्यमंत्री ने व्यापारी संघठनों से दो दिन का समय मांगा था। इन संघठनों के अग्रणियों ने व्यापारियों को समझाकर इस कठिन समय में सरकार को सभी प्रकार से सहयोग देने की बात कहीं थीं व्यापारी संघठनों द्वारा फर्ज निभाने के बाद उनकी बात सुनी नहीं गई। 
उध्दव सरकार ने व्यापारियों को अपनी तरफ से कोई राहत नहीं दी लेकिन उन्होंने लोन के हफ्ते में राहत देने और मार्च व अप्रैल में भरनेवाले जीएसटी रिटर्न का समय बढ़ाकर देने की मांग केंद्र सरकार से की है। सरकार ने इस महामारी को कुदरती आपत्ति मानकर डिसेस्टर रिस्पोन्स फंड के तहत वित्तीय आबंटन की मांग की है। 
ठाकरे सरकार अपना हक मांग रही है तो उन्हें व्यापारियों के प्रति फर्ज भी निभाना चाहिए।  

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