देश का हाल-बेहाल : जिम्मेदार कौन?

देशभर में महामारी का हाहाकार मचा है- इसके लिए किसे दोष दें? केद्र सरकार को? राज्य सरकार को? या फिर अपनी नसीब को? चारों तरफ- कोने-कोने से लोगों की बदहाली का समाचार आ रहा है। वैक्सिन की विश्व के लिए फैक्ट्री माने जाने वाले भारत में आज वैक्सिन की कमी है! आक्सिजन-प्राणवायु के लिए शासन और लोग परेशान हø। हॉस्पिटलों में मरीजों को बरामदे- लॉबी में सुलाया जा रहा है। मैदानों में एम्ब्युलेंस खड़ीकर- कामचलाऊं उपचार किया जा रहा है। आखिर लोग कहां जाएं? स्मशान में? अरे नसीब देखो आदमी जी नहीं सकता और मरे तो `स्मशान' में मृतदेह की भी लाइन लगी है। महानगरों में आधा-अधूरा कर्फ्यू और अंधाधुंधी मास्क और पार्किंग के बहाने-अथवा नाम पर पुलिस दाड़ा सकती है और दंड कर सकती है- तो लोग-व्यापारी वर्ग विरोध करें नहीं तो क्या करें? आज लोगों के जीव पर आ गया है और हालत बिगड़ती रही तो कानून की समस्या बढ़कर सुलग सकती है। शासक लोगों की भीड़ को दोष देते हø- लेकिन अपने जन-जीवन के लिए किया क्या है? पूर्व आयोजन के घोर अभाव के लिए शासन के सिवा कौन  जिम्मेदार है?
महामारी के प्रथम प्रहार के समय जनता में भी जोश था। कामगारों की घर वापसी का विवाद था, लेकिन मृत्यु का आंकड़ा नियंत्रण में रहा और जनजीवन के लिए नियंत्रणों में ढील थी। इस समय दूसरा प्रहार आएगा- लेकिन शासन ने क्या तैयारी की? वैक्सिन का उत्पादन और आपूर्ति थी तो बहिष्कार का फतवा निकला और वैक्सिन की एक्सपायरी डेट न हो उसके लिए निर्यात हुआ-मदद-स्वास्थ्य दानरूप और व्यापार स्तर पर भी इसके लिए विपक्ष और लोग भी प्रधानमंत्री मोदी को दोष देते हø- इसके कारण इस समय कमी है, यदि उत्पादन और आबंटन उचित ढंग के हो तो कमी और शिकायत नहीं रहे, लेकिन आयोजन का ही अभाव है। विश्व से और देश के कोने-कोने से खाना-खराबी का समाचार टीवी पर आने लगा तो जनजागृति नहीं- लोग पहले जागे और वैक्सिन की मांग बढ़ी। सभी उम्र के लोगों के लिए छूट दी जाए तो कैसी अंधाधूंधी और भीड़ होगी। इसकी कल्पना ही कर सकते हø। अब प्रशासन तंत्र अचानक हरकत में आकर वैक्सिन का आयात और उत्पादन की छूट दे रहा है। आग लगी तो कुंआ खोदने लगे हø! इसमें भी प्राणवायु की कमी होगी यह खबर नहीं थी? तो विशेषज्ञों और टॉस्कफोर्स की क्या कामना है? दवा मिले नहीं, हॉस्पिटल में बेड मिले नहीं और आक्सिजन मिले नहीं तो `हवा कौन खा रहा है?'
निजी क्षेत्र में मुकेश अंबानी की पहल करने के बाद अन्य कंपनियां आक्सिजन देने के लिए आगे आ रही है- तो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां कब जुड़ेगी?
टीवी पर पश्चिम बंगाल की सार्वजनिक सभा और रोड शो देखकर लोग भड़के नहीं तो क्या ताली बजाकर तमाशा देखें? बंगाल चुनाव के बाकी चरण का कार्यक्रम बदला नहीं जा सकता- लेकिन नेताओं के मुंह पर मास्क ठूंसा जाए की नहीं? लाखों और करोड़ों प्रचार में खर्च करने वाली राजनीतिक पार्टियां और उनके समर्थकों और लोगों को पूरा मास्क दिया जाए ऐसा आदेश क्यों नहीं दिया जाए- यह तो पूर्व शर्त होनी चाहिए।
हरिद्वार में कुंभ मेला की भीड़ निश्चितरूप से चिंताजनक है, इसके बावजूद वहां कोरोना-जांच की व्यवस्था तो हुई। ऐसी व्यवस्था चुनावी सभा-और `शोभायात्रा' के लिए क्यों नहीं? निरंजन अखाड़ा के महंथ कुंभमेला की समाप्ति की घोषणा की। कोई राजनीतिक पक्ष 
प्रचार-समाप्ति की घोषणा नहीं करें।
जनजीवन को रोजी-रोटी-की तुलना में अधिक महत्व-प्राधान्य देना ही चाहिए, लेकिन जनजीवन बचाने के लिए रोजी-रोटी अनिवार्य है। इसका प्रबंध हो रहा है? आवश्यक और अनावश्यक चीज और सेवा की स्पष्टता भी नहीं- और कामगार की लाचारी शुरू हुई है- घर वापसी के लिए। लेकिन जो लोग और व्यापारी वर्ग `घर' में ही है उनका क्या? जवाब कौन देगा?      

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