साझा सुविधा स्थापित करके पानी को ट्रीट किया जाएगा

सूरत में कपड़ा उद्योग के लिए 
सूरत । दक्षिण गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एन्ड इंडस्ट्रीज द्वारा 'हाउ टु रीयूज'कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट' पर वेबिनार आयोजित किया गया। 
 गत दिनों दक्षिण गुजरात चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री द्वारा 'हाउ टु रीयूज'कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट' पर वेबिनार आयोजित किया गया। जिसमें उद्योग जगत के विशेषज्ञ श्री गिरीश लूथरा और कुणाल शाह ने कपड़ा उद्योग को टिकाए रखने के लिए कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की जरूरतों पर महत्वपूर्ण मार्गदर्शन दिया। 
श्री  गिरीश लूथरा ने कहा कि सूरत में उद्योग को प्रति दिन लगभग 600 एमएलडी पानी की जरूरत है।  उद्योग की जरूरतों को पूरा करने के लिए भूजल और नदी का पानी वर्तमान में महत्वपूर्ण स्रोत हैं।  रंगाई मिलों और वॉटरजेट लूमों को पानी की जरूरत रहती है। अत: भविष्य में पानी की कमी का सामना न करना पड़े इसलिए उद्योग को अपशिष्ट जल के रिसाइकिल और उपयोग की दिशा में सोचना होगा ताकि भविष्य में उद्योग को पानी की कमी का सामना न करना पड़े।  उन्होंने सीईटीपी के बाद पुनर्चक्रण और जीरो लिक्विड डिस्चार्ज जैसे विकल्पों पर विस्तार से बताया।  रीसाइक्लिंग में तृतीयक, अल्ट्रा निस्पंदन और आरओ पर चर्चा की।  जीरो लिक्विड डिस्चार्ज में रहते हुए उन्होंने सोलर ड्राइंग, मैकेनिकल ड्राइंग और समुद्री बहिर्वाह पर मार्गदर्शन प्रदान किया। 
उन्होंने आगे कहा कि भारत में गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडु और तेलंगाना में कपड़ा उद्योग विकसित हुआ है।  जिस देश में कपड़ा उद्योग का विकास हुआ है, वहां के 80% क्षेत्रों में पानी की कमी एक समस्या बन गई है।  जल शोधन परियोजनाओं को जारी रखने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें उद्योगों के साथ सहयोग कर रही हैं।  इसलिए सरकार और उद्योग को वित्त, तकनीकी और क्लस्टर प्रबंधन पर मिलकर काम करने की आवश्यकता है। 
 कुणाल शाह ने कहा, `कपड़ा उद्योग को रुचि जगा कर प्राथमिकता के साथ पानी को रीसायकल करना होगा।`  कपड़ा उद्योग में प्रोसेसिंग यूनिटों के बाद अब वॉटरजेट लूम क्षेत्र में पानी की जरूरत बढ़ती जा रही है।  उद्योग से निकलने वाला लगभग 33 प्रतिशत पानी पुनब् उपयोग योग्य है और इसे वाष्पित करने की आवश्यकता है।  वाटरजेट से निकलने वाले पानी को रंगाई घर में इस्तेमाल किया जा सकता है और फिर इस पानी को कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट में ट्रीट किया जाता है।  फिलहाल पांडेसरा में निगम द्वारा पानी की आपूर्ति की जाती है।  सचिन को सिंचाई या जीआईडीसी से पानी मिलता है।  जबकि कड़ोदरा में बोरिंग पानी से उद्योग चल रहा है।  लेकिन भविष्य में जब भूजल उपलब्ध नहीं होगा और सीधे पानी का उपयोग नहीं किया जा सजेगा , तो कोई समस्या पैदा नही हो इस हेतु अभी से जागृत होना पड़ेगा। 
इसके अलावा, उन्होंने कहा, लोग बोरिंग के माध्यम से मिट्टी से बड़ी मात्रा में पानी निकाल रहे हैं और इससे पानी की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है।  आने वाले वर्ष़ों में उद्योग को जीवित रहने के लिए पानी का पुनर्चक्रण करना होगा।  इसके लिए उद्योग को दिलचस्पी लेनी होगी और पानी के पुनर्चक्रण पर ध्यान देना होगा और एक साझा सुविधा बनाने के लिए उपयुक्त डिजाइन तैयार करना होगा।  उन्होंने कहा कि कई कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट डिजाइन किए गए होंगे लेकिन भविष्य में सीईटीपी को टीडीएस आदि कैसे आएगा, इसका विस्तार से अध्ययन करके एक उचित डिजाइन बनाना होगा। 
 चैंबर के निर्वाचित अध्यक्ष श्री आशीष गुजराती ने वेबिनार में स्वागत भाषण दिया।  जबकि ग्रुप चेयरमैन हिमांशु बोडावाला ने प्रश्नों का संचालन किया। 

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