गुजरात के बाद अब महाराष्ट्र में `धमाका'' होगा?

महाराष्ट्र की राजनीति में शरद पवार के `धमाका' के बाद धमाल शुरू होने की तैयारी है तो गुजरात में मुख्यमंत्री विजयभाई रुपाणी की सरकार ने इस्तीफा दिया है। अलबत्ता- भाजपा की स्थिति मजबूत करने के लिए नई नेतागीरी के तहत विधानसभा चुनाव करने का व्यूह नरेद्र मोदी- अमित शाह ने बनाया है, ऐसा लगता है। संभव है कि भाजपा के अन्य मुख्यमंत्री भी इस्तीफा दें। विपक्षी एकता के लिए मारे-मारे फिरते नेताओं की हालत ऐसी है कि जैसे नींद में ही झपट में आ गए है। उत्तर प्रदेश के साथ ही कुछ राज्यों में चुनाव कराया जाएगा, महाराष्ट्र भी इस सूची में जुड़े तो आश्चर्य नहीं होगा।
सरहद पर और उत्तर प्रदेश तथा महाराष्ट्र में सत्ता के लिए राजनीति शुरू हो गयी है। तालिबानी सरकार अफगानिस्तान में आतंक फैला रही है, आतंकवादी सरकार में बैठे है तो आतंकवादी भय के सामने प्रतिकार के कदम पर विचार कर रहे है। अमेरिका, ब्रिटेन और रशिया के सुरक्षा सलाहकारों ने दिल्ली आकर विचार-विमर्श किया है। अमेरिका सीआईए के प्रमुख ने इस्लामाबाद का दौरा भी कर लिया है- अफगानिस्तान में अमेरिकनों की सुरक्षा के अलावा पाकिस्तान में तालिबान के बढ़ते प्रभाव की चर्चा होना माना जा रहा है। पाकिस्तान का कहना है कि- अफगानिस्तान को अकेले- अलग कर देने से खतरा बढ़ेगा, तालिबान अन्य इस्लामी देशों पर दबाव बढ़ाएगा। लगभग सभी देश, अफगानिस्तान पर नजर रखकर तालिबान सरकार को मान्यता देने से पहले इंतजार कर रहे है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव करीब आ रहा है तो ओवैसी आक्रामक बनकर उत्तेजित कर रहे है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की तुलना में कांग्रेस को अधिक खतरा है। भाजपा के सामने कौमवाद की गंभीर चुनौती है। कांग्रेस का जहां तक संबंध है उनकी हालत `एक साधे बिना तेरह टूटे'- ऐसी है। विपक्षी एकता का प्रयास भी कांग्रेस के आग्रह-दुराग्रह के कारण सफल नहीं हो रही है। इस बीच राष्ट्रवादी कांग्रेस के शरद पवार ने कहा है कि कांग्रेस में गांधी परिवार की मानसिकता और नेतागीरी (अर्थात्-प्रधानमंत्री पद की दावेदारी) के कारण विपक्षी एकता की आशा नहीं है। शरद पवार अब तक ऐसा आरोप लगा रहे थे कि भाजपा सरकार विपक्षी नेताओं के माथे पर `जांच' की तलवार लटकाकर रखी है। अब कांग्रेस निशाने पर है, कांग्रेस अभी पुराने जमाने के जमीनदार की तरह जी रही है! राज-पाट जाने के बाद अभी राजा पाठ में है। `महाराष्ट्र में सत्ता की भागीदारी करने, मुख्यमंत्री पद के बारे में समझौता किया तो राष्ट्रीय स्तर पर क्यों नहीं? कांग्रेस में दूसरी पंक्ति के नेता नहीं है और प्रभावशाली नेताओं ने प्रादेशिक पक्ष बनाकर सत्ता प्राप्त की है, जबकि कांग्रेस तितर-वितर हो गयी है'।- ऐसी आलोचना भी पवार साहब ने की है। 23 सीनियर नेताओं द्वारा आवाज उठाने के बाद पवार ने उन्हें समर्थन दिया है।
अब शरद पवार का वक्तव्य-स्पष्ट बात के बाद किस हद तक स्फोटक बनता है यह देखना है। कांग्रेस पक्ष के सीनियर नेताओं ने- अशोक चौहाण सहित- प्रतिक्रिया नहीं देने के लिए गणेश चतुर्थी उत्सव का बहाना किया। वास्तव में कांग्रेस के प्रादेशिक नेता `हाईकमांड' को पूछे बगैर एक शब्द बोल नहीं सकते। अलबत्ता, सीनियर नेताओं ने शरद पवार की आलोचना कर सोनियाजी- राहुलजी की नेतागीरी का बचाव किया है।
अब राष्ट्रीय तख्ते पर दिग्विजय जैसे नेता पवार पर `अटैक' करेंगे। महाराष्ट्र में सत्ता की भागीदारी छोड़ने-तोड़ने को तैयार होंगे? भाजपा की नीति रुको- इंतजार करो- देखो आगे-आगे होता है क्या- है। राज्य सरकार टूटे-इसका इंतजार है। यदि कांग्रेस समर्थन खींचे तो सरकार गिरने के बदले महाराष्ट्र कांग्रेस में फूट जरूर होगी और पवार- राष्ट्रवादी कांग्रेस को लाभ होगा। इसके बावजूद राजनीतिक अस्थिरता का चिन्ह हो तो राष्ट्रपति शासन आए और भ्रष्टाचार की जांच की रिपोर्ट भूल जाएगी। महाराष्ट्र कांग्रेस में फूट पड़ी तो इसका असर देशव्यापी होने का अनुमान है।
कांग्रेस के एक वर्ग का मानना है कि पवार अब केद्र सरकार के साथ अलिखित-अपरोक्ष समझौता करना चाहते है। राष्ट्रवादी के अनिल देशमुख की जांच निर्णायक दौर में है- महाराष्ट्र के नेताओं पर जांच की तलवार लटक रही है। सरकारी बøकों और मंडलियों के कारोबार की जांच हो रही है- सहकारी क्षेत्र में राष्ट्रवादी का `एकाधिकार' भय में है- वास्तव में कांग्रेस के कारण साथी पक्षों का भविष्य ही भय में है! आगामी महीना- उत्तर प्रदेश का चुनाव पहले- दिशा-निर्देश करेगा।   

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