ग्रे के भाव घटे, यार्न में थोड़ी मंदी

हमारे संवाददाता
राजस्थान राज्य प्रदूषण बोर्ड ने बालोतरा सीईटीपी को तत्काल प्रभाव से कारखानों का पानी शोधन हेतु नये आदेशों तक न लेने का फरमान जारी करने से ऊहा-पौह की स्थिति बन गई है। औद्योगिक क्षेत्र के सीईटीपी से जुड़े प्रतिष्ठानों की हालत इससे बेहाल हो गई है। उत्पादन न लेने की स्थिति बनने से इन उद्यमियों के सपने चकनाचूर हो गये हैं। दिवाली की सीजन चलने की आशायें भी धूल-धूसरित सी हो गई है। मजदूरों की रोजी-रोटी की समस्या इससे स्वत: उभर गई है। स्मरण रहे बालोतरा औद्योगिक क्षेत्र इस दंश से कई बार पीड़ित रहा है और भिन्न-भिन्न प्रकार के कष्ट झेलने को मजबूर हुआ है। लगता है यह यहां के उद्योगों की नियति का एक भाग है। उद्योगों के साथ प्रदूषण की समस्या तो रहती है, पर उनके निराकरण से समाधान होता है। देखा यह जाता है कि सक्षम अधिकारी केवल मात्र फाल्ट फाइन्डर का रोल अदा करते हैं, जब तक वे उसे ठीक करने के लिए उत्तरदायी न ठहराये जायें तो समस्या विकट रूप में उपस्थित हुए बिना नहीं रहती।
स्थानीय वस्त्र रंगाई-छपाई उद्योग में विकास व विस्तार की बहुमुखी सम्भावनायें विद्यमान है, परंतु जब भी प्रदूषण की इस प्रकार की समस्या उभर जाती है, तो कल्पनायें और निर्धारित लक्ष्य शंकाओं के घेरे में आकर अस्तित्व खोने से लग जाते हैं। उत्पादन बन्दी के इस माहौल में उद्यमियों की हालत विचारणीय बन जाती है। वर्तमान परिपेक्ष में कई औद्योगिक संस्थानों ने अपना संयंत्र अन्यत्र स्थापित करने का मानस बनाया है और कईयों के तो अपना काफी कुछ उद्यम प्रक्रियाएं स्थानांतरित करने के समाचार है।
कभी यह सोचा जाता था की स्थानीय रंगाई-छपाई उद्योग के उत्पाद विकास के शिखर को छू लेंगे, परन्तु अब वर्तमान परिस्थितियों से जो हालात उत्पन्न हुए हैं उससे प्रश्न चिन्ह लग गया है। प्रगति की विपुल संभावनाओं पर अब ग्रहण लगा नजर आ रहा है। प्रयासों पर प्रयास चल रहे हैं परन्तु उनकी सफल परणीति कब हो सकेगी, इसके बारे में निश्चित रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता। इतना अवश्य है कि सीईटीपी संचालन प्रारंभके आदेशों में जितना विलंब होगा, उतनी ही अधिक क्षति वस्त्र उद्योग को भुगतनी पड़ेगी। यह बात समझने की है कि यहां उद्योग भीमकाय देश के अन्य उद्योगों की भांति निष्णात सुविज्ञ शिक्षित हाथों में नहीं है। यहां के उद्यमी तकनीकी ज्ञान से अनभिज्ञ हैं, वे अपने अनुभव व पुश्तैनी आधार पर कार्य को कुशलता से गुणवत्ता के साथ कर रहे हैं। कानूनी पेचदगियों के संदर्भ में इनके भटकने का डर है। अत: व्यवहारिकता व सरलता के परिपेक्ष में इन विकासोन्मुख उद्योगों का पालन होना चाहिए।
प्रदूषण की ज्वलंत समस्या का हल जो बताया जा रहा है वह विचारणीय है। लंबे समय से यह मांग की जा रही है कि पाली, बालोतरा, जसोल, जोधपुर आदि क्षेत्रों का निष्कासित जल का पाइपलाइन के जरिये कच्छ की खाड़ी में पहुंचाया जावे तो यह वरदान स्वरूप समाधान होगा। इस संबंध में कई संस्थानों ने अनुरोध किया है, जिस पर सर्वजन हिताय व औद्योगिक चहुंमुखी सर्वांगीण प्रगति के लिए सरकार को बहुमुखी इस योजना को अमलीजामा पहिनाने हेतु पहल करनी चाहिए।
स्थानीय विधायक मदन प्रजापत इस क्षेत्र के वस्त्र उद्योग को जीवन रेखा सदृश इंगित करते हैं। क्षेत्र के वस्त्र उद्योग के प्रति उनका सारगर्भित दृष्टिकोण सराहनीय है। ये प्रथम विधायक हैं जिन्होंने प्रदूषण के संदर्भ में जारी नियमों की पालनों में एकरूपता हेतु मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है। उनका कथन है कि जब पाली, जोधपुर आदि कारखानों के जल को नदी में निसृत कर सकते हैं तो बालोतरा को भी इससे महरूम नहीं रखा जाये। विधायक प्रजापत ने सरकार को अनुदान राशि सीईटीपी ट्रस्ट को मुहैया कराने के लिए मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है।
औद्योगिक क्षेत्र में बन्दी के दौरान उत्पादन पर विराम लग गया है। तैयार माल के भावों में इजाफा होने की संभावनायें बढ़ी है। पापलीन, नाईटी, रेमन्ड, रियोन, पेटीकोट, कुर्ती, सलवार सूट, रुबिया, पाकेटिंग क्लाथ, थैली क्लाथ के भावों में तेजी की स्थिति अनुसार नई रेट लिस्टें भेजी जा रही है तथापि पुराने ग्राहकों को माल नई रेट लिस्ट से नीचे व पुरानी रेट लिस्ट के ऊपर में सौदे होने के समाचार है। बन्दी के कारण ग्रे लेवाली के सौदों में उद्यमियों को विशेष दिलचस्पी नहीं दिखाई दे रही है। ग्रे क्लाथ के भाव घटने की स्थिति में तो नहीं है, परन्तु यार्न के भावों में तनिक सी मन्दी से माहौल संकुचित हो गया है।

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