बंदरगाहों पर कंटेनर के फंसे होने से बासमती चावल निर्यात घटा

मुंबई। सीमा शुल्क, आदि विभागों के साथ विवादों के कारण लगभग 25,000-30,000 कंटेनर बंदरगाहों पर पड़े हैं जिससे बासमती चावल के निर्यात को भारी नुकसान हुआ है क्योंकि 80 प्रतिशत कंटेनरों का शीपमेंट हो जाता है। किसानों को डर है कि कम बारिश और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कम कवरेज से कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) यार्ड में उनकी उपज कम बिक पा रही है। 
वित्तीय सेवा क्रेडिट रेटिंग कंपनी इन्फोमेरिक्स वैल्यूएशन एंड रेटिंग के अनुसार, निजी व्यापारियों की कम भागीदारी, कमजोर बुनियादी ढांचे, अनभिज्ञता आदि के कारण एपीएमसी के माध्यम से बेचे जाने वाले चावल की मात्रा 17 प्रतिशत (2013) से घटकर 2.7 प्रतिशत (2019) रह गई है।   
`राइस इंडस्ट्री - इमर्जिंग कंटूर्स` रिपोर्ट भी भारत में चावल उद्योग के भविष्य के बारे में यह एजेंसी आशावादी है। यह नई प्रणालियों, प्रौद्योगिकियों और चावल के बीज की नई किस्मों पर ध्यान देने के साथ एक व्यापक चावल रणनीति की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है। यह इस क्षेत्र में संरचनात्मक परिवर्तन लाने के लिए सरकार की पहल और मानसून की अनिश्चितताओं पर निर्भरता की सीमा को कम करने के प्रभावी तरीकों को बताती है। 
कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्र-विशिष्ट मतभेदों के बावजूद, चावल उत्पादन में सरकारी समर्थन, अनुकूल मानसून, चावल प्रोसेसिंग कंपनियों की बढ़ती संख्या और बढ़ते निर्यात जैसे सामान्य कारकों ने भारतीय चावल उद्योग पर सकारात्मक प्रभाव डाला है। 
रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले कुछ वर्ष़ों में खरीफ और रबी दोनों मौसमों में चावल का उत्पादन बढ़ा है। 2013-14 और 2020-21 के बीच कुल उत्पादन में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई। 
चावल (बासमती और गैर-बासमती सहित) का देश के कुल अनाज निर्यात में एक बड़ा हिस्सा (चार-पांचवें से अधिक) है। धान की खेती के तहत तेलंगाना, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश का कुल क्षेत्रफल 80 प्रतिशत से अधिक है, जो वित्त वर्ष 2015 में 30 लाख हेक्टेयर से बढ़कर वित्त वर्ष 2015 में 35 लाख हेक्टेयर हो गया।

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