हरियाणा में एमएसपी पर बाजरा खरीद हेतु पुनर्विचार करने की आवश्यकता

हमारे संवाददाता
नई दिल्ली । बाजरा उत्पादक किसानों की परेशानी हरियाणा सरकार को समझनी चाहिए।पिछले वर्ष तक हरियाणा सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर बाजरा स्वयं खरीदती थी।बहरहाल इस बार हरियाणा सरकार ने नई व्यवस्था लागू की है।जिसके तहत हरियाणा सरकार बाजरा नहीं खरीद रही है बल्कि बाजार में बाजरे का मूल्य प्रति क्विंटल 1650 रुपए क्विंटल मानते हुए किसानों को 600 रुपए प्रति क्विंटल की दर से अलग से राशि दे रही है।बहरहाल समस्या यह है कि बाजार में किसानों का बाजरा 1200 रुपए प्रति क्विंटल में ही बिक रहा है।इससे उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य के बराबर राशि नहं मिल रही है।उल्लेखनीय है कि हरियाणा सरकार की मंशा गलत नहीं है।किसानों को सब्जियों में घाटा न हो इसलिए उसने भावांतर योजना आरंभ की है।
दरअसल भावांतर यानी भाव में अंतर इसकी भरपाई सरकार करती है।यह योजना सफल भी है।जिससे सब्जी उत्पादक किसानों को इससे राहत मिली है।इससे सब्जी फसल पर जब बाजार में बहुत सस्ती मिलने लगती है तो सरकार किसानों को उसका वाजिब भाव तय कर जो अंतर होता है वह किसान को दे देती है।वहीं इस बार बाजरा के लिए भी सरकार ने यही व्यवस्था लागू की है।ऐसा करना सरकार की विवशता थी क्योंकि राजस्थान और पंजाब के बड़े किसान और आढती हरियाणा के बिचौलियों की मिलीभगत से अपना बाजरा हरियाणा में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेचकर मुनाफा कमाते थे क्योंकि उनके यहां बाजार में बाजरा बामुश्किल 1200 रुपए प्रति क्विंटल बिकता था और वह 2250 रुपए में मिलीभगत कर हरियाणा सरकार की खरीद एजेंसियों के हवाले कर देते थे।इसका बड़ा कारण यह भी था कि पंजाब और राजस्थान में वहां की सरकारें बाजारे की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद नहीं करती थी।जब यह तथ्य हरियाणा सरकार के संज्ञान में आया तो उसने इस पर अंकुश लगाने के लिए सोचा।यह स्वभाविक था क्योंकि कोई भी सरकार अपने किसानों के हितों की ही चिंता करेगी।इसलिए उसने भावांतर जैसे नई व्यवस्था बनाई बहरहाल अब किसानों को समुचित लाभ कैसे मिले जिसके बारे में भी सरकार को चिंता करनी चाहिए।

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