कृषि कुरूक्षेत्र में जीत किसकी?

तीन कृषि कानून रद करने की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश में करने के बाद अब कृषि कुरूक्षेत्र में जीत किसकी? -विषय पर चर्चा शुरू हो गई है। प्रधानमंत्री के निर्णय और घोषणा के कारण सभी को आकार्य हो यह स्वाभाविक है- जबकि विपक्ष में विजय का श्रेय लेने की नई स्पर्धा शुरू हो गई है- कौन जीता कौन हारा? – कि चर्चा का जवाब मोदी ने एक ही वाक्य में दे दिया है: मैंने जो किया वो किसानों के हित में किया है और जो कर रहा हूं वो देश के हित में है।  
चाणक्यनीति भी कहती है कि एक राजा की भावना भले ही शुध्द- ईमानदार हो, लेकिन  जनभावना के विरूद्ध हो तो उस पर विचार या अमल नहीं करना चाहिए... 
तीनों कृषि कानून किसानों मुख्यत: छोटे- मध्यम किसानों के हित में होने से नकारा नहीं जा सकता- 80 प्रतिशत किसान दो हेक्टर से छोटी जोतवाले है और ऐसे किसानों की संख्या दस करोड़ के करीब है इनकी ऊपज का उचित- वाजिब प्रतिलाभ मिले यह भावना थी- शुध्द इरादा और समर्पण की भावना होने के बावजूद हम किसान भाईयों को समझा नहीं सकें, यह प्रधानमंत्री ने स्वीकारा हैं। गत आठ वर्ष में कृषि विकास और किसान- हित में जितनी योजनाएं और अमल वर्तमान सरकार द्वारा किया गया है उसके आंकड़ों की जानकारी भी उन्होंने दी।  
आंदोलन राजनीति प्रेरित होने के बावजूद नरेंद्र मोदी ने किसी पर भी दोषारोपण करना टाला है और देशवासियों के समक्ष खेद व्यक्त किया है कि हमारी कार्य तपस्या में ही कही कुछ कमी रह गई होगी जिसे हम दीपक के प्रकाश की तरह सत्य बता- समझा नहीं सकें- अब उन्होंने किसान भाईयों से अपील की है- नए सिरे से शुरूआत करके आगे बढ़े।  
राजनीतिक पीछे हट में भी समय पसंद करने में मोदी अजोड़ हैं- देव दिवाली और प्रकाश पर्व गुरूनानक देवजी और गुरूगोविंद सिंहजी की उपदेशवाणी का उल्लेख किया है। पाकिस्तान में करतारपुर गुरूद्वारा का द्वार खुलवाया गया है।  
किसानों और सीख समाज के लिए आज प्रकाश पर्व के साथ राजनीतिक जगत में भी भले ही - श्रेय लेने का वाद-विवाद हो, देशभर राहत की सांस लेगा, होना ही चाहिए। मोदी के दृढ़ निर्णयात्मक स्वभाव से परिचित और प्रभावित लोगों की निराशा भी स्वाभाविक है: फिर भी मोदी का निर्णय देश हित में है, इसे स्वीकारना चाहिए। पंजाब-उत्तर प्रदेश के चुनावों में लाभ हो या नहीं हो- वह जनता- मतदाताओं का फैसला होगा। लेकिन भावना और मांग के सम्मुख झुककर मोदी ने अहंकारी- डिक्टेटर आदि विशेषणों को बेमानी बना दिया है।  
मोदी सरकार के निर्णय से कृषि सुधारों को अब राजनीतिक ग्रहण लगने की आशंका है, फिर भी किसानों को उनकी ऊपज के वाजिब दाम मिल सकें उसके लिए विशेष समिति नियुक्त की जाएगी। आंदोलन के दौरान मोदी के किसान विरोधी होने का कुप्रचार किया गया था- इससे अब किसानों को भरोसा होगा कि पीछे हट के बावजूद मोदी को किसानों की आगेकूच की चिंता है।  
2014 में प्रधानमंत्री पद की जिम्मेदारी उठाने के बाद मोदी ने उद्योगों के लिए जमीन प्राप्त करने- भूमि अधिग्रहण-किसानों को उचित मुआवजा दिलाने की घोषणा की थी, तब प्रमुख विपक्ष कांग्रेस ने गलतफहमी फैलाकर ब्रेक लगाया था। इसके बाद आर्थिक सुधारों के विरोध के लिए राजनीतिक व्यू को दूसरी बार आजमाया गया है। विपक्ष की नजर कृषि सुधार पर नहीं, पीछे हट के बाद मोदी हटाओ नारा- आएगा लेकिन फैसला जनता करेगी।  
जिस खेलदिली और देशभक्ति की भावना से प्रधानमंत्री मोदी ने पीछे हट की है, वैसी ही वृत्ति और प्रवृत्ति अब पक्ष बताएंगे क्या? नई शुरूआत नए सिरे से करने में सहकार देंगे?

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